गायत्री यंत्र

गायत्री यंत्र माँ गायत्री की स्तुति के लिए है। परंपरा में साधक इस आशा से इसका सहारा लेते हैं कि आध्यात्मिक रुचि और कामनाओं की राह सहज हो। आध्यात्मिक प्रार्थनाओं को शाश्वत जगत की खिड़की माना जाता है, और परंपरा मानती है कि आध्यात्मिक कामनाएँ पूरी होने पर व्यक्ति शांति और आनंद से जी सकता है।

गायत्री यंत्र और देवी गायत्री

परंपरा में गायत्री यंत्र रखने वाला साधक शांति, सद्भाव, आनंद, आंतरिक संतोष और सकारात्मक दृष्टि की कामना करता है।

आध्यात्मिक रुचि

कुछ पुरानी परंपराओं में कठिन समय में भी गायत्री यंत्र का सहारा लिया जाता है।

इन परंपराओं में अभिमंत्रित गायत्री यंत्र को साफ़ पानी में डुबोया जाता है, और वह पानी व्यक्ति या भवन पर छिड़का जाता है। यह भक्ति की एक प्रथा है, किसी विशेषज्ञ की सलाह का विकल्प नहीं।

देवी गायत्री

देवी गायत्री गायत्री यंत्र की देवी हैं, और गायत्री मंत्र की भी।

ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

उन्हें पाँच मुखों वाली और प्रायः कमल पर विराजमान दिखाया जाता है।

उनके चार मुख चारों वेदों के प्रतीक हैं, और पाँचवाँ मुख सर्वशक्तिमान ईश्वर का। परंपरा में उनका संबंध भगवान सूर्य से भी माना जाता है।