तारों से बँधे वैदिक राशिचक्र की 12 राशियों में से हर एक 30 अंश की है। भारत में “आपकी राशि” का मतलब आमतौर पर चंद्र राशि होता है: जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में थे। वैदिक और पश्चिमी राशिचक्र एक-दूसरे से खिसके हुए हैं, इसलिए एक ही नाम की पश्चिमी राशि और आपकी राशि अक्सर अलग होती हैं।
लेखक: यंत्र गुरु, भाग्य कार्ड्स का संपादकीय विभाग · अपडेट:
आकाश की जिस पट्टी में सूर्य, चंद्रमा और ग्रह चलते दिखते हैं, ज्योतिष उसे एक चक्र मानता है और दो तरह से बाँटता है: 12 राशियों में और 27 नक्षत्रों में। हर नक्षत्र के 4 पद हैं, कुल 108, और हर राशि में ठीक नौ पद आते हैं, यानी सवा दो नक्षत्र।
इसीलिए कुछ नक्षत्र दो राशियों में बँटे हैं: कृत्तिका का पहला पद मेष में है और बाक़ी तीन वृषभ में। दोनों बँटवारे एक ही बिंदु से गिने जाते हैं, जहाँ मेष और अश्विनी साथ-साथ शुरू होते हैं। यह चक्र तारों से बँधा है, ऋतुओं से नहीं; हम गणना कैसे करते हैं, वह अलग पेज पर है।
बाहर का घेरा बारह राशियाँ हैं, भीतर का घेरा 27 नक्षत्र; हर निशान एक पद है, और नौ पद मिलकर एक राशि बनाते हैं।
चंद्र राशि या सूर्य राशि: आपकी राशि कौन सी है
भारत में कोई आपकी राशि पूछे, तो मतलब आमतौर पर चंद्र राशि होता है: जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में थे। कुंडली में यही जन्म राशि लिखी जाती है। चंद्रमा एक राशि में लगभग सवा दो दिन रहते हैं, इसलिए इसे जानने के लिए जन्म की तारीख़, समय और जगह चाहिए।
पश्चिमी ज्योतिष में “आपकी राशि” सूर्य राशि है, और वह भी पश्चिम के अपने राशिचक्र में। कई घरों में नाम के पहले अक्षर से ‘नाम राशि’ भी देखी जाती है, जो जन्म राशि से अलग हो सकती है। भाग्य कार्ड ऐप में अपनी कुंडली बनाकर आप अपनी चंद्र राशि और नक्षत्र देख सकते हैं।
बारह संक्रांतियाँ: सूर्य का साल
सूर्य जिस दिन एक राशि से अगली राशि में जाते हैं, उसे संक्रांति कहते हैं। साल में ऐसी बारह संक्रांतियाँ होती हैं, और हर एक से एक सौर मास शुरू होता है; तमिल, मलयालम, बंगाली और ओड़िया कैलेंडर अपने महीने इसी तरह गिनते हैं।
मकर संक्रांति सबसे जानी-पहचानी है: परंपरा में उसी से उत्तरायण शुरू होता है, और कर्क संक्रांति से दक्षिणायन। मेष संक्रांति पर कई प्रदेश अपना नया साल मनाते हैं, जैसे बैसाखी, विषु और पुथांडु। हर संक्रांति की तारीख़ आपके शहर के हिसाब से त्योहार कैलेंडर में है।
मेष से राशिचक्र की गिनती शुरू होती है, और नक्षत्रों की भी: इसका पहला नक्षत्र अश्विनी पूरे चक्र का पहला नक्षत्र है। इसके स्वामी मंगल हैं, जो वृश्चिक के भी स्वामी हैं।
सूर्य के मेष में आने का दिन, मेष संक्रांति, कई प्रदेशों का नया साल है। पंजाब में यह बैसाखी है, रबी की फ़सल का त्योहार। केरल में विषु की सुबह घर के लोग आँख खोलते ही सबसे पहले विषुक्कणि देखते हैं: एक बड़े पात्र में सजे चावल, फल, अमलतास के पीले फूल और जलता दीया।
आकाश में वृषभ का हिस्सा आसानी से पहचाना जाता है। कृत्तिका का छोटा, झिलमिलाता तारा-गुच्छा और रोहिणी का लाल-नारंगी तारा इसी में हैं; ‘रोहिणी’ का अर्थ ही है ‘लाल रंग वाली’।
पुराणों की कथा में दक्ष की 27 बेटियाँ 27 नक्षत्र हैं, और उनमें रोहिणी चंद्रमा को सबसे प्रिय हैं। वृषभ शुक्र की राशि है, और शुक्र की दूसरी राशि तुला है।
पश्चिम में यह राशि जुड़वाँ भाइयों की है, पर भारतीय परंपरा में मिथुन स्त्री-पुरुष का जोड़ा है। वराहमिहिर के वर्णन में पुरुष के हाथ में गदा है और स्त्री के हाथ में वीणा।
जिन दो चमकीले तारों को पश्चिम जुड़वाँ भाई कहता है, वे भारत में पुनर्वसु नक्षत्र हैं, और उनके पास ही आर्द्रा का लाल तारा है। मिथुन के स्वामी बुध हैं, जिनकी दूसरी राशि कन्या है।
कर्क अकेली राशि है जिसके स्वामी चंद्र हैं, इसलिए चंद्र राशि की बात करने वाले इस पेज पर इसकी अपनी जगह है। पुष्य पूरा का पूरा इसी राशि में है; जब चंद्रमा गुरुवार को पुष्य में हों, तो उस योग को गुरु पुष्यामृत कहते हैं, और कई परिवार उस दिन सोना या घर की कोई नई चीज़ ख़रीदते हैं।
परंपरा में कर्क संक्रांति से दक्षिणायन शुरू होता है: सूर्य के दक्षिण की ओर चलने के छह महीने, जिन्हें देवताओं की रात कहा गया है। मकर संक्रांति पर उत्तरायण के साथ उनका दिन लौटता है।
सिंह सूर्य की अकेली राशि है, जैसे कर्क चंद्र की। इसका पहला नक्षत्र मघा है, और आकाश में सिंह की आकृति के हृदय पर मघा का चमकता तारा दिखता है।
गुरु लगभग बारह साल में एक बार सिंह राशि में आते हैं, और उस समय को सिंहस्थ कहते हैं। नासिक-त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन के कुम्भ मेले इसी नाम से जाने जाते हैं, जब गोदावरी और शिप्रा के घाटों पर स्नान के लिए भीड़ उमड़ती है।
सूर्य और चंद्र एक-एक राशि के स्वामी हैं, बाक़ी पाँच ग्रह दो-दो के; इस गिनती में राहु और केतु की कोई राशि नहीं।
भारतीय परंपरा में कन्या राशि का चिह्न नाव में बैठी एक युवती है, जिसके एक हाथ में अनाज है और दूसरे में अग्नि। बुध की यह दूसरी राशि है, और इसमें हस्त नक्षत्र है, जिसके नाम का अर्थ ‘हाथ’ है।
कन्या संक्रांति पर बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम में विश्वकर्मा पूजा होती है, और कारीगर अपने औज़ारों और मशीनों की पूजा करते हैं। पितृ पक्ष भी आमतौर पर उन्हीं दिनों आता है जब सूर्य कन्या राशि में होते हैं।
तुला से चक्र का दूसरा आधा शुरू होता है, ठीक मेष के सामने, और इसके स्वामी शुक्र हैं। स्वाति का नारंगी तारा, उत्तरी आकाश के सबसे चमकीले तारों में एक, इसी हिस्से में है।
कर्नाटक के कोडगु में तलकावेरी पर तुला संक्रमण का क्षण बड़ा पर्व है। भक्त मानते हैं कि उस क्षण कुंड में जल उमड़ता है और कावेरी माँ प्रकट होती हैं; इसे तीर्थोद्भव कहते हैं।
आकाश में यह राशि सचमुच बिच्छू जैसी दिखती है, और उसके बीच में ज्येष्ठा का लाल तारा है; ‘ज्येष्ठा’ का अर्थ है ‘सबसे बड़ी’। यह मंगल की दूसरी राशि है; पश्चिमी ज्योतिष कभी-कभी इसके साथ प्लूटो जोड़ता है, पर नवग्रहों में प्लूटो नहीं है।
केरल में सूर्य के वृश्चिक में आने से मलयालम महीना वृश्चिकम् शुरू होता है। उसी पहले दिन से सबरीमला में 41 दिन का मंडल काल शुरू होता है, जिसमें भक्त व्रत रखकर अय्यप्पा के दर्शन को जाते हैं।
धनु का चिह्न धनुष है, या धनुष ताने धनुर्धर। इसका पहला नक्षत्र मूल है, जिसका अर्थ ‘जड़’ है।
सूर्य के धनु में रहने का महीना धनुर्मास है, जो मकर संक्रांति पर पूरा होता है; उत्तर भारत में इसे खरमास भी कहते हैं। तमिल घरों में यह मार्गऴि का महीना है, जब भोर में आंडाल की तिरुप्पावै के पद रोज़ एक-एक करके गाए जाते हैं। धनु गुरु की राशि है, और गुरु की दूसरी राशि मीन है।
मकर परंपरा का एक जलचर है, जिसे गंगा और वरुण का वाहन माना जाता है। पश्चिम में भी इस राशि का चिह्न पानी से जुड़ा है: आधी बकरी, आधी मछली। इसके स्वामी शनि हैं।
सूर्य के मकर में आने का दिन मकर संक्रांति है, जब उत्तरायण शुरू होता है और धनुर्मास पूरा होता है। महाराष्ट्र में लोग तिल-गुड़ बाँटकर मीठा बोलने को कहते हैं, गुजरात में पतंगें उड़ती हैं, और तमिलनाडु में पोंगल उफनता है। महाभारत में भीष्म शरशय्या पर उत्तरायण की ही प्रतीक्षा करते हैं।
हिंदी का ‘मगर’ शब्द संस्कृत के ‘मकर’ से ही निकला है।
कुम्भ का चिह्न घड़ा लिए एक पुरुष है, और पश्चिम में भी यह जल ढालने वाले की राशि है। पुराणों की कथा में समुद्र-मंथन से निकला अमृत एक कुम्भ में था, और उसकी बूँदें प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिरीं; कुम्भ मेले का नाम इसी घड़े से है।
हरिद्वार का कुम्भ तब लगता है जब गुरु कुम्भ राशि में होते हैं। कुम्भ शनि की राशि है, और शनि की दूसरी राशि मकर है।
मीन का चिह्न दो मछलियाँ हैं। पुराणों में विष्णु का पहला अवतार भी मत्स्य है, वह मछली जिसने प्रलय के जल में मनु की नाव खींची।
बारहवीं और आख़िरी राशि में चक्र पूरा होता है: रेवती के आख़िरी पद के बाद फिर मेष और अश्विनी आते हैं। मीन गुरु की दूसरी राशि है, और धनु की तरह सूर्य के मीन में रहने के महीने को भी उत्तर भारत में खरमास कहते हैं।
राशि आकाश के उस चक्र का बारहवाँ हिस्सा है जिसमें सूर्य, चंद्रमा और ग्रह चलते दिखते हैं, और हर राशि 30 अंश की है। वैदिक ज्योतिष में यह चक्र तारों से बँधा है, और किसी ग्रह की जगह इसी से बताई जाती है कि वह किस राशि में है।
मेरी राशि कौन सी है, यह कैसे पता करूँ?
आमतौर पर आपकी राशि का मतलब चंद्र राशि है, यानी जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में थे; इसके लिए जन्म की तारीख़, समय और जगह चाहिए। भाग्य कार्ड ऐप में अपनी कुंडली बनाकर आप इसे देख सकते हैं, और चंद्र राशि और सूर्य राशि का फ़र्क़ इसी पेज पर ऊपर समझाया गया है।
पश्चिमी राशि अक्सर अलग क्यों होती है?
पश्चिमी राशिचक्र ऋतुओं से बँधा है, जबकि वैदिक राशिचक्र तारों से, और पृथ्वी की धुरी के धीमे डगमगाने से दोनों का अंतर सदियों में बढ़ता गया है। इसलिए सूर्य किसी वैदिक राशि में उसी नाम की पश्चिमी राशि से कुछ हफ़्ते बाद पहुँचते हैं, और साथ ही पश्चिम सूर्य राशि देखता है, भारत चंद्र राशि। हम गणना कैसे करते हैं, वह अलग पेज पर है।
संक्रांति क्या है?
जिस दिन सूर्य एक राशि से अगली राशि में जाते हैं, वह उस राशि की संक्रांति है, और साल में ऐसी बारह संक्रांतियाँ होती हैं। सबसे जानी-पहचानी मकर संक्रांति है; हर संक्रांति की तारीख़ त्योहार कैलेंडर में है।
राशियाँ और नक्षत्र आपस में कैसे जुड़े हैं?
दोनों एक ही चक्र के दो बँटवारे हैं: 12 राशियाँ और 27 नक्षत्र, और हर नक्षत्र के 4 पद। हर राशि में नौ पद आते हैं, इसलिए कोई नक्षत्र पूरा एक राशि में होता है और कोई दो राशियों में बँटा होता है; हर नक्षत्र का हिस्सा सत्ताईस नक्षत्रों वाले पेज पर है।
आज का पंचांग, भाग्य कार्ड ऐप में
मुफ़्त भाग्य कार्ड ऐप, वेब पर और फ़ोन पर, आपके शहर का आज का पंचांग दिखाता है: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण, सूर्योदय और सूर्यास्त। उसी में कुंडली, जन्म नक्षत्र और बच्चों के नाम जैसे टूल भी हैं।