चंद्रमा के पड़ाव

सत्ताईस नक्षत्र: नाम, चरण, स्वामी और कथाएँ

नक्षत्र आकाश के उन 27 बराबर हिस्सों में से एक है जिनसे होकर चंद्रमा गुज़रता है; हर हिस्सा 13°20′ का है। चंद्रमा लगभग 27⅓ दिन में सारे नक्षत्र पार करता है, यानी हर नक्षत्र में क़रीब एक दिन। पंचांग हर दिन का नक्षत्र बताता है, और जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका जन्म नक्षत्र है।

नक्षत्रराशियाँ

नक्षत्रों की सूची

नक्षत्र यहाँ पंचांग के क्रम में हैं, अश्विनी से रेवती तक; किसी भी नाम को चुनकर सीधे उसका हिस्सा पढ़ें।

अश्विनीभरणीकृत्तिकारोहिणीमृगशिराआर्द्रापुनर्वसुपुष्यआश्लेषामघापूर्वा फाल्गुनीउत्तरा फाल्गुनीहस्तचित्रास्वातिविशाखाअनुराधाज्येष्ठामूलपूर्वाषाढाउत्तराषाढाश्रवणधनिष्ठाशतभिषापूर्वा भाद्रपदाउत्तरा भाद्रपदारेवती

राशियों और नक्षत्रों का एक ही चक्र

चंद्रमा और सूर्य का मार्ग एक घेरा है, जिसे परंपरा दो तरह से बाँटती है: 12 राशियों में और 27 नक्षत्रों में। दोनों बँटवारे चरणों पर आकर मिलते हैं, क्योंकि हर राशि में ठीक नौ चरण आते हैं।

राशियों और नक्षत्रों का चक्र: बाहर 12 राशियों का घेरा, भीतर 27 नक्षत्रों का घेरा, और 108 चरणों के निशान
बाहरी घेरा 12 राशियाँ हैं, भीतरी घेरा 27 नक्षत्र; हर निशान एक चरण है, और नौ चरणों से एक राशि बनती है।

नक्षत्र क्या है

परंपरा में चंद्रमा के मार्ग को 27 पड़ावों में बाँटा गया है, और हर पड़ाव का नाम उसके पास चमकते किसी तारे या तारा-समूह पर है। चंद्रमा रोज़ लगभग एक नक्षत्र आगे बढ़ता है, इसलिए हर रात उसके पास कोई और तारा होता है।

तिथि, वार, योग और करण के साथ नक्षत्र पंचांग के पाँच अंगों में से एक है; आज का नक्षत्र आज के पंचांग में देखें। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वह आपका जन्म नक्षत्र है, और उसे आप ऐप के जन्म नक्षत्र टूल में जान सकते हैं।

हर नक्षत्र के चार चरण, हर राशि में नौ

हर नक्षत्र चार बराबर चरणों में बँटा है, इसलिए पूरे चक्र में 108 चरण हैं, और हर राशि में नौ, यानी सवा दो नक्षत्र। इसी से कुछ नक्षत्र दो राशियों की सीमा पर पड़ते हैं: कृत्तिका का पहला चरण मेष में है और बाक़ी तीन वृषभ में।

परंपरा में हर चरण का एक अक्षर है, और नामकरण संस्कार में बच्चे का नाम अक्सर जन्म नक्षत्र के चरण वाले अक्षर से शुरू किया जाता है। जन्म की तारीख़, समय और जगह से ऐप का बच्चे के नाम वाला टूल नक्षत्र, चरण और उसके अक्षर बताता है।

नक्षत्रों के नाम पर बारह महीने

चांद्र महीनों के नाम नक्षत्रों से आए हैं: जिस महीने की पूर्णिमा पर चंद्रमा जिस नक्षत्र में या उसके पास होता है, महीना उसी के नाम पर है। चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ, पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा से आषाढ़, श्रवण से श्रावण, दोनों भाद्रपदाओं से भाद्रपद।

अश्विनी से आश्विन, कृत्तिका से कार्तिक, मृगशिरा से मार्गशीर्ष, पुष्य से पौष, मघा से माघ, और दोनों फाल्गुनियों से फाल्गुन। हर बार पूर्णिमा ठीक उसी नक्षत्र में हो, यह ज़रूरी नहीं; कई बार वह पड़ोस के नक्षत्र में पड़ती है।

नक्षत्रों की कथाएँ

पुराणों की कथा में 27 नक्षत्र दक्ष प्रजापति की बेटियाँ हैं, जिनका विवाह चंद्र से हुआ, पर चंद्र का मन रोहिणी में ही रमा। बहनों की शिकायत पर दक्ष के शाप से चंद्र क्षीण होने लगे, और प्रभास तीर्थ में, जहाँ आज सोमनाथ है, भगवान शिव की कृपा से शाप हल्का हुआ। परंपरा एक पखवाड़ा घटता और एक पखवाड़ा बढ़ता चंद्रमा इसी कथा से समझाती है।

कृत्तिका की छह बहनों ने स्कंद को पाला, इसी से वे कार्तिकेय हुए। अथर्ववेद की सूची में उत्तराषाढा और श्रवण के बीच 28वाँ नक्षत्र अभिजित है, जिसके तारे को पश्चिम में वेगा कहते हैं।

अश्विनी

“अश्वों वाली”

क्रम
27 में से 1
राशि
मेष, चरण 1–4
स्वामी
केतु
देवता
अश्विनी कुमार
प्रतीक
घोड़े का सिर
तारे
शेरतान और मेसार्थिम (मेष तारामंडल)
गण
देव
योनि
अश्व (नर)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
कुचला

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 चू मेष
  2. चरण 2 चे मेष
  3. चरण 3 चो मेष
  4. चरण 4 ला मेष

मेष तारामंडल के सिर पर दो पास-पास तारे, मेढ़े के सींगों की तरह, अश्विनी की पहचान हैं। आज की सूची अश्विनी से शुरू होती है, और आश्विन महीने का नाम इसी से आया है।

देवता अश्विनी कुमार जुड़वाँ भाई हैं। पुराणों की कथा में वे सूर्य और संज्ञा के पुत्र हैं, जब संज्ञा घोड़ी के रूप में थीं। नक्षत्र के नाम और प्रतीक, दोनों में भी घोड़ा है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

भरणी

“धारण करने वाली”

क्रम
27 में से 2
राशि
मेष, चरण 1–4
स्वामी
शुक्र
देवता
यम
प्रतीक
योनि, या नाव
तारे
मेष तारामंडल के तीन तारे (35, 39 और 41 एरीएटिस)
गण
मनुष्य
योनि
गज (नर)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
आंवला
कैलेंडर में
भरणी श्राद्ध

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 ली मेष
  2. चरण 2 लू मेष
  3. चरण 3 ले मेष
  4. चरण 4 लो मेष

मेष तारामंडल के तीन मद्धम तारे एक छोटा-सा त्रिकोण बनाते हैं; यही भरणी है। नाम ‘भृ’ धातु से है, जिसमें भार उठाने और सँभालने का भाव है।

भरणी के देवता यम हैं। पितृ पक्ष में जिस दिन भरणी नक्षत्र हो, उस दिन कई परिवार भरणी श्राद्ध करते हैं, जिसे महाभरणी भी कहते हैं।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

कृत्तिका

“काटने वाली”

क्रम
27 में से 3
राशि
मेष 1; वृषभ 2–4
स्वामी
सूर्य
देवता
अग्नि
प्रतीक
चाकू या उस्तरा
तारे
कृत्तिका तारापुंज (प्लीएडीज़)
गण
राक्षस
योनि
मेष (मादा)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
गूलर
कैलेंडर में
कार्तिकस्वामी दर्शन

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 अ मेष
  2. चरण 2 ई वृषभ
  3. चरण 3 उ वृषभ
  4. चरण 4 ए वृषभ

वृषभ तारामंडल में छह-सात तारों का छोटा-सा झुंड, जिसे पश्चिम में प्लीएडीज़ कहते हैं, आकाश के सबसे जाने-पहचाने तारा-समूहों में से एक है। वेदों के समय की नक्षत्र-सूची कृत्तिका से शुरू होती थी, अश्विनी से नहीं।

कार्तिक महीने का नाम कृत्तिका से है। कार्तिक पूर्णिमा पर चंद्रमा कृत्तिका में हो, तो कई परिवार कार्तिकस्वामी दर्शन के लिए कार्तिकेय के मंदिर जाते हैं; उनकी कथा ऊपर कथाओं में है।

साफ़ और अँधेरे आसमान में ज़्यादातर लोग कृत्तिका में छह तारे गिन पाते हैं, और परंपरा में भी कृत्तिकाएँ छह हैं।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

रोहिणी

“लाल रंग वाली”

क्रम
27 में से 4
राशि
वृषभ, चरण 1–4
स्वामी
चंद्र
देवता
ब्रह्मा
प्रतीक
गाड़ी या रथ
तारे
अल्डेबरान
गण
मनुष्य
योनि
सर्प (नर)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
जामुन

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 ओ वृषभ
  2. चरण 2 वा वृषभ
  3. चरण 3 वी वृषभ
  4. चरण 4 वू वृषभ

वृषभ तारामंडल का नारंगी-लाल तारा अल्डेबरान रोहिणी है, और नाम का अर्थ भी लाल है। आकाश में इसके लगभग ठीक सामने ज्येष्ठा का लाल तारा एंटारेस है, इसलिए दोनों एक साथ रात में नहीं दिखते।

कथा में रोहिणी चंद्र की सबसे प्रिय पत्नी हैं। भागवत परंपरा में श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ, इसलिए जन्माष्टमी पर रोहिणी का भी ध्यान रखा जाता है।

उत्तर भारत में सूर्य के रोहिणी में आने के बाद के नौ दिनों को नौतपा कहते हैं, जो परंपरा में गर्मी के सबसे तीखे दिन गिने जाते हैं।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

मृगशिरा

“हिरण का सिर”

क्रम
27 में से 5
राशि
वृषभ 1–2; मिथुन 3–4
स्वामी
मंगल
देवता
चंद्र (सोम)
प्रतीक
हिरण का सिर
तारे
मेइसा (ओरायन तारामंडल)
गण
देव
योनि
सर्प (मादा)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
खैर
कैलेंडर में
मृगशिरा नक्षत्र में सूर्य प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 वे वृषभ
  2. चरण 2 वो वृषभ
  3. चरण 3 का मिथुन
  4. चरण 4 की मिथुन

ओरायन तारामंडल के सिर पर तीन मद्धम तारों का छोटा त्रिकोण मृगशिरा है, और परंपरा पूरे ओरायन में एक हिरण देखती है। पास ही आकाश का सबसे चमकीला तारा सीरियस है, जिसका एक संस्कृत नाम मृगव्याध है, यानी हिरण का शिकारी।

मार्गशीर्ष महीने का नाम मृगशिरा से है। सूर्य के मृगशिरा में आने से वर्षा के नक्षत्र गिने जाने लगते हैं, और महाराष्ट्र के किसान ‘मृग’ के दिनों में मानसून की राह देखते हैं।

मृगशिरा से स्वाति तक के ग्यारह नक्षत्र वर्षा के नक्षत्र माने जाते हैं। सूर्य जब इनमें से किसी में आता है, कैलेंडर वह दिन लिखता है, और किसान उसी हिसाब से बारिश की राह देखते हैं।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

आर्द्रा

“नम, गीली”

क्रम
27 में से 6
राशि
मिथुन, चरण 1–4
स्वामी
राहु
देवता
रुद्र
प्रतीक
आँसू की बूँद, या हीरा
तारे
बीटलजूस
गण
मनुष्य
योनि
श्वान (मादा)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
शीशम
कैलेंडर में
सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 कू मिथुन
  2. चरण 2 घ मिथुन
  3. चरण 3 ङ मिथुन
  4. चरण 4 छ मिथुन

ओरायन के कंधे पर चमकता लाल तारा बीटलजूस आर्द्रा है। नाम का अर्थ है नम, और सूर्य के आर्द्रा में रहते बारिश की आस बनी रहती है।

देवता रुद्र से जुड़ी एक परंपरा तमिलनाडु में है: मार्गऴि महीने में आर्द्रा के दिन चिदंबरम में नटराज का आरुद्रा दर्शन होता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

पुनर्वसु

“फिर से भला”, यानी प्रकाश का लौटना

क्रम
27 में से 7
राशि
मिथुन 1–3; कर्क 4
स्वामी
गुरु
देवता
अदिति
प्रतीक
धनुष और तरकश
तारे
कैस्टर और पोलक्स
गण
देव
योनि
मार्जार (मादा)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
बाँस
कैलेंडर में
सूर्य का पुनर्वसु नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 के मिथुन
  2. चरण 2 को मिथुन
  3. चरण 3 हा मिथुन
  4. चरण 4 ही कर्क

मिथुन तारामंडल के दो चमकीले तारे, कैस्टर और पोलक्स, अगल-बगल दिखते हैं; जोड़ी इतनी साफ़ है कि पश्चिम में भी इन्हें जुड़वाँ भाई माना गया। यही पुनर्वसु हैं।

वाल्मीकि रामायण में प्रभु श्रीराम का जन्म उस नक्षत्र में बताया गया है जिसकी देवता अदिति हैं, यानी पुनर्वसु। सूर्य के पुनर्वसु में रहते भी बारिश की आस रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

पुष्य

“पोषण करने वाला”

क्रम
27 में से 8
राशि
कर्क, चरण 1–4
स्वामी
शनि
देवता
बृहस्पति
प्रतीक
गाय का थन, या कमल
तारे
असेलस बोरियालिस और असेलस ऑस्ट्रेलिस
गण
देव
योनि
मेष (नर)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
पीपल
कैलेंडर में
गुरु पुष्यामृत योग, सूर्य का पुष्य नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 हू कर्क
  2. चरण 2 हे कर्क
  3. चरण 3 हो कर्क
  4. चरण 4 डा कर्क

कर्क तारामंडल के दो मद्धम तारों के बीच, अँधेरी रात में, धुएँ जैसा एक धब्बा दिखता है, जो तारों का एक झुंड है। पुष्य इसी हिस्से में है, और पौष का नाम इसी से है।

देवता बृहस्पति हैं, और गुरुवार भी उन्हीं का वार है। गुरुवार को पुष्य हो, तो इसे गुरु पुष्यामृत योग कहते हैं; उस दिन कई परिवार सोना-चाँदी ख़रीदते हैं। सूर्य के पुष्य में रहते भी बारिश की आस रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

आश्लेषा

“आलिंगन, लिपटना”

क्रम
27 में से 9
राशि
कर्क, चरण 1–4
स्वामी
बुध
देवता
सर्प (नाग देवता)
प्रतीक
सर्प
तारे
हाइड्रा तारामंडल के सिर के तारे
गण
राक्षस
योनि
मार्जार (नर)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
नागकेसर
कैलेंडर में
सूर्य का आश्लेषा नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 डी कर्क
  2. चरण 2 डू कर्क
  3. चरण 3 डे कर्क
  4. चरण 4 डो कर्क

हाइड्रा तारामंडल के सिर के मद्धम तारे एक छोटे घेरे में हैं; यही आश्लेषा है। हाइड्रा का अर्थ है पानी का साँप, यानी पश्चिम ने भी यहाँ साँप ही देखा, और परंपरा में आश्लेषा के देवता सर्प हैं।

नाम का भाव है लिपटना, जैसे साँप किसी डाल से लिपट जाता है। सूर्य के आश्लेषा में रहते भी बारिश की आस रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

मघा

“उदार”, या “महान”

क्रम
27 में से 10
राशि
सिंह, चरण 1–4
स्वामी
केतु
देवता
पितृ देवता
प्रतीक
राजसिंहासन
तारे
रेगुलस
गण
राक्षस
योनि
मूषक (नर)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
बरगद
कैलेंडर में
मघा श्राद्ध, सूर्य का मघा नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 मा सिंह
  2. चरण 2 मी सिंह
  3. चरण 3 मू सिंह
  4. चरण 4 मे सिंह

सिंह तारामंडल का सबसे चमकीला तारा रेगुलस मघा है, और वह सूर्य के मार्ग पर लगभग ठीक बैठा है। लैटिन में रेगुलस का अर्थ है छोटा राजा, और मघा का प्रतीक राजसिंहासन है।

मघा के देवता पितृ हैं, और पितृ पक्ष में मघा नक्षत्र के दिन कई परिवार मघा श्राद्ध करते हैं। माघ महीने का नाम मघा से है, और सूर्य के मघा में रहते बारिश की आस बनी रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

पूर्वा फाल्गुनी

“पहली लालिमा वाली”

क्रम
27 में से 11
राशि
सिंह, चरण 1–4
स्वामी
शुक्र
देवता
भग
प्रतीक
पलंग के आगे के पाए
तारे
ज़ोस्मा और चेर्टन (सिंह तारामंडल)
गण
मनुष्य
योनि
मूषक (मादा)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
पलाश
कैलेंडर में
सूर्य का पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 मो सिंह
  2. चरण 2 टा सिंह
  3. चरण 3 टी सिंह
  4. चरण 4 टू सिंह

सिंह तारामंडल के पिछले हिस्से में चार तारे एक चौकोर बनाते हैं, जैसे पलंग के चार पाए। आगे के दो पाए पूर्वा फाल्गुनी हैं और पीछे के दो उत्तरा फाल्गुनी, और फाल्गुन महीने का नाम इन्हीं से है।

भग का अर्थ ही हिस्सा है, और वेदों में वे हर किसी को उसका हिस्सा बाँटने वाले देवता हैं। सूर्य के पूर्वा फाल्गुनी में रहते भी बारिश की आस रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

उत्तरा फाल्गुनी

“बाद की लालिमा वाली”

क्रम
27 में से 12
राशि
सिंह 1; कन्या 2–4
स्वामी
सूर्य
देवता
अर्यमा
प्रतीक
पलंग के पीछे के पाए
तारे
डेनेबोला (सिंह तारामंडल)
गण
मनुष्य
योनि
गौ (नर)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
रुद्राक्ष
कैलेंडर में
सूर्य का उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 टे सिंह
  2. चरण 2 टो कन्या
  3. चरण 3 पा कन्या
  4. चरण 4 पी कन्या

सिंह की पूँछ का तारा डेनेबोला उत्तरा फाल्गुनी है; अरबी में डेनेबोला का अर्थ ही शेर की पूँछ है। महाभारत में अर्जुन कहते हैं कि उनका जन्म उत्तरा फाल्गुनी में हुआ, इसीलिए उनका एक नाम फाल्गुन है।

देवता अर्यमा वेदों में मित्रता, अतिथि-सत्कार और विवाह के बंधन से जुड़े हैं। सूर्य के उत्तरा फाल्गुनी में रहते बारिश की आस रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

हस्त

“हाथ”

क्रम
27 में से 13
राशि
कन्या, चरण 1–4
स्वामी
चंद्र
देवता
सविता
प्रतीक
हाथ, या मुट्ठी
तारे
कॉर्वस तारामंडल के पाँच मुख्य तारे
गण
देव
योनि
महिष (मादा)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
चमेली
कैलेंडर में
श्रावणी (सामवेदी), सूर्य का हस्त नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 पू कन्या
  2. चरण 2 ष कन्या
  3. चरण 3 ण कन्या
  4. चरण 4 ठ कन्या

कॉर्वस तारामंडल के पाँच तारे एक खुली हथेली की तरह दिखते हैं, जैसे पाँच उँगलियाँ। उत्तर भारत में बोलचाल में इसे हथिया कहते हैं, और हथिया की बारिश को गर्मी की विदाई माना जाता है।

देवता सविता सूर्य का एक रूप हैं। सामवेद की परंपरा वाले परिवार श्रावणी उपाकर्म, यानी जनेऊ बदलने और वेदपाठ के नए आरंभ का दिन, हस्त नक्षत्र पर मनाते हैं।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

चित्रा

“चमकीली”

क्रम
27 में से 14
राशि
कन्या 1–2; तुला 3–4
स्वामी
मंगल
देवता
त्वष्टा
प्रतीक
चमकता रत्न, या मोती
तारे
स्पाइका
गण
राक्षस
योनि
व्याघ्र (मादा)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
बेल
कैलेंडर में
सूर्य का चित्रा नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 पे कन्या
  2. चरण 2 पो कन्या
  3. चरण 3 रा तुला
  4. चरण 4 री तुला

कन्या तारामंडल का चमकीला, नीला-सफ़ेद तारा स्पाइका चित्रा है। आज की नक्षत्र-गणना में चक्र का आरंभ, यानी अश्विनी का पहला बिंदु, चित्रा के ठीक सामने माना जाता है।

चैत्र महीने का नाम चित्रा से है। देवता त्वष्टा देवताओं के शिल्पी हैं, और सूर्य के चित्रा में रहते वर्षा के आख़िरी दिनों की आस रहती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

स्वाति

“अति उत्तम”, या “स्वतंत्र”

क्रम
27 में से 15
राशि
तुला, चरण 1–4
स्वामी
राहु
देवता
वायु
प्रतीक
पौधे की कोंपल, या मूँगा
तारे
आर्कटुरस
गण
देव
योनि
महिष (नर)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
अर्जुन
कैलेंडर में
सूर्य का स्वाति नक्षत्र में प्रवेश

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 रू तुला
  2. चरण 2 रे तुला
  3. चरण 3 रो तुला
  4. चरण 4 ता तुला

उत्तरी आकाश का सबसे चमकीला तारा, नारंगी आर्कटुरस, स्वाति है। यह आसपास के तारों से अलग, अकेला चमकता दिखता है, और नाम का एक अर्थ स्वतंत्र भी है।

कवियों की परंपरा में स्वाति की बूँद सीप में गिरे तो मोती बनती है, और केले में गिरे तो कपूर; रहीम का एक दोहा इसी पर है। वर्षा के ग्यारह नक्षत्रों में स्वाति आख़िरी है, जिसके बाद बारिश की आस थमने लगती है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

विशाखा

“शाखाओं वाली”

क्रम
27 में से 16
राशि
तुला 1–3; वृश्चिक 4
स्वामी
गुरु
देवता
इंद्र और अग्नि
प्रतीक
विजय तोरण, या कुम्हार का चाक
तारे
ज़ुबेनएलजेनुबी और ज़ुबेनएस्कमाली (तुला तारामंडल)
गण
राक्षस
योनि
व्याघ्र (नर)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
कैथ

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 ती तुला
  2. चरण 2 तू तुला
  3. चरण 3 ते तुला
  4. चरण 4 तो वृश्चिक

तुला तारामंडल के दो तारे विशाखा हैं, जैसे एक डाल की दो शाखाएँ। अरबी में इनके नामों का अर्थ है दक्षिणी पंजा और उत्तरी पंजा, यानी वहाँ भी यह जोड़ी दो हिस्सों में बँटी है।

देवता इंद्र और अग्नि, दो देव एक साथ हैं। वैशाख महीने का नाम विशाखा से है, क्योंकि उस महीने की पूर्णिमा का चंद्रमा इसी के आसपास रहता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

अनुराधा

“राधा के बाद आने वाली”

क्रम
27 में से 17
राशि
वृश्चिक, चरण 1–4
स्वामी
शनि
देवता
मित्र
प्रतीक
विजय तोरण, या कमल
तारे
एक्राब, जुब्बा और फ़ैंग (वृश्चिक तारामंडल)
गण
देव
योनि
मृग (मादा)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
मौलसिरी
कैलेंडर में
ज्येष्ठागौरी आवाहन

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 ना वृश्चिक
  2. चरण 2 नी वृश्चिक
  3. चरण 3 नू वृश्चिक
  4. चरण 4 ने वृश्चिक

वृश्चिक तारामंडल के सिर पर तीन तारे एक हल्के मोड़ में हैं; यही अनुराधा है। देवता मित्र वेदों में मित्रता और दिए हुए वचन के देवता हैं।

महाराष्ट्र में भाद्रपद के गणेशोत्सव में ज्येष्ठागौरी तीन नक्षत्रों पर मनाई जाती हैं: अनुराधा पर आवाहन, ज्येष्ठा पर पूजन और मूल पर विसर्जन।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

ज्येष्ठा

“सबसे बड़ी”

क्रम
27 में से 18
राशि
वृश्चिक, चरण 1–4
स्वामी
बुध
देवता
इंद्र
प्रतीक
छत्र या कुंडल
तारे
एंटारेस (वृश्चिक तारामंडल)
गण
राक्षस
योनि
मृग (नर)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
चीड़
कैलेंडर में
ज्येष्ठगौरी पूजन

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 नो वृश्चिक
  2. चरण 2 या वृश्चिक
  3. चरण 3 यी वृश्चिक
  4. चरण 4 यू वृश्चिक

वृश्चिक का लाल हृदय, तारा एंटारेस, ज्येष्ठा है। एंटारेस नाम का अर्थ है ‘मंगल का प्रतिद्वंद्वी’, क्योंकि उसका रंग मंगल ग्रह जैसा लाल है।

ज्येष्ठ महीने का नाम ज्येष्ठा से है, और इसके देवता इंद्र देवों के राजा हैं। गणेशोत्सव में ज्येष्ठागौरी का पूजन इसी नक्षत्र के दिन होता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

मूल

“जड़”

क्रम
27 में से 19
राशि
धनु, चरण 1–4
स्वामी
केतु
देवता
निर्ऋति
प्रतीक
जड़ों का गुच्छा, या अंकुश
तारे
लगभग वृश्चिक तारामंडल की पूँछ के तारे
गण
राक्षस
योनि
श्वान (नर)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
साल
कैलेंडर में
ज्येष्ठागौरी विसर्जन, सरस्वती आवाहन

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 ये धनु
  2. चरण 2 यो धनु
  3. चरण 3 भा धनु
  4. चरण 4 भी धनु

वृश्चिक की मुड़ी हुई पूँछ और डंक के तारे, लगभग, मूल हैं। नाम का अर्थ जड़ है, और प्रतीक भी जड़ों का गुच्छा है।

नवरात्रि में मूल नक्षत्र के दिन माँ सरस्वती का आवाहन होता है, और कई घरों में इन दिनों किताबें और पोथियाँ सरस्वती के आगे रखी जाती हैं। ज्येष्ठागौरी का विसर्जन भी मूल पर होता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

पूर्वाषाढा

“पहली अजेय”

क्रम
27 में से 20
राशि
धनु, चरण 1–4
स्वामी
शुक्र
देवता
आपः (जल देवता)
प्रतीक
सूप, या हाथी दाँत
तारे
काउस मीडिया और काउस ऑस्ट्रेलिस (धनु तारामंडल)
गण
मनुष्य
योनि
वानर (नर)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
अशोक
कैलेंडर में
सरस्वती पूजन

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 भू धनु
  2. चरण 2 धा धनु
  3. चरण 3 फा धनु
  4. चरण 4 ढा धनु

धनु तारामंडल के तारे मिलकर केतली जैसी आकृति बनाते हैं, और टोंटी की ओर के दो तारे पूर्वाषाढा हैं। प्रतीक सूप है, अनाज फटकने वाला।

देवता आपः हैं, यानी जल। आषाढ़ महीने का नाम दोनों आषाढ़ा नक्षत्रों से है, और नवरात्रि में सरस्वती पूजन पूर्वाषाढा पर होता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

उत्तराषाढा

“बाद की अजेय”

क्रम
27 में से 21
राशि
धनु 1; मकर 2–4
स्वामी
सूर्य
देवता
विश्वेदेव
प्रतीक
हाथी दाँत, या छोटा पलंग
तारे
नंकी और असेला (धनु तारामंडल)
गण
मनुष्य
योनि
नकुल (नर)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
कटहल
कैलेंडर में
सरस्वती बलिदान

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 भे धनु
  2. चरण 2 भो मकर
  3. चरण 3 जा मकर
  4. चरण 4 जी मकर

धनु की केतली के हत्थे की ओर के तारे, नंकी और असेला, उत्तराषाढा हैं। इसके आख़िरी हिस्से से श्रवण की शुरुआत तक पुरानी सूचियों का अभिजित नक्षत्र था।

देवता विश्वेदेव हैं, सारे देवों का एक समूह। नवरात्रि में सरस्वती बलिदान इसी नक्षत्र पर होता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

श्रवण

“सुनना”

क्रम
27 में से 22
राशि
मकर, चरण 1–4
स्वामी
चंद्र
देवता
विष्णु
प्रतीक
कान, या तीन पदचिह्न
तारे
अल्टेयर और उसके पास के दो तारे (गरुड़ तारामंडल)
गण
देव
योनि
वानर (मादा)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
आक
कैलेंडर में
सरस्वती विसर्जन, श्रावणी उपाकर्म (ऋग्वेदी)

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 जू / खी मकर
  2. चरण 2 खू मकर
  3. चरण 3 खे मकर
  4. चरण 4 खो मकर

गरुड़ तारामंडल में चमकीला अल्टेयर और उसके दोनों ओर एक-एक तारा, लगभग सीधी पंक्ति में, श्रवण हैं। परंपरा इन तीन तारों में वामन के तीन पग देखती है, और श्रवण के देवता विष्णु हैं।

श्रावण महीने का नाम श्रवण से है, और ऋग्वेद की परंपरा वाले परिवारों का श्रावणी उपाकर्म इसी नक्षत्र पर होता है। नवरात्रि में सरस्वती विसर्जन भी श्रवण पर होता है।

केरल का ओणम तिरुवोणम के दिन मनाया जाता है, जो श्रवण का ही मलयालम नाम है; ओणम वामन और राजा महाबली की कथा से जुड़ा है।

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धनिष्ठा

“सबसे धनी”, या “सबसे प्रसिद्ध”

क्रम
27 में से 23
राशि
मकर 1–2; कुम्भ 3–4
स्वामी
मंगल
देवता
अष्ट वसु
प्रतीक
मृदंग, या बाँसुरी
तारे
लगभग डॉल्फ़िनस तारामंडल के चार मुख्य तारे
गण
राक्षस
योनि
सिंह (मादा)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
शमी

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 गा मकर
  2. चरण 2 गी मकर
  3. चरण 3 गू कुम्भ
  4. चरण 4 गे कुम्भ

डॉल्फ़िनस के चार तारे, लगभग, एक छोटा चौकोर बनाते हैं; यही धनिष्ठा है, जिसका पुराना नाम श्रविष्ठा है। ज्योतिष के सबसे पुराने ग्रंथ वेदांग ज्योतिष में उत्तरायण का आरंभ श्रविष्ठा के आरंभ पर बताया गया है।

देवता आठ वसु हैं। महाभारत में भीष्म आठ वसुओं में से एक का अवतार हैं, गंगा के आठवें पुत्र।

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शतभिषा

शततारका नाम से “सौ तारे”

क्रम
27 में से 24
राशि
कुम्भ, चरण 1–4
स्वामी
राहु
देवता
वरुण
प्रतीक
खाली वृत्त
तारे
लगभग सदाकबिया और उसके पास के धुंधले तारे (कुम्भ तारामंडल)
गण
राक्षस
योनि
अश्व (मादा)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
कदंब
कैलेंडर में
वरुणी योग

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 गो कुम्भ
  2. चरण 2 सा कुम्भ
  3. चरण 3 सी कुम्भ
  4. चरण 4 सू कुम्भ

कुम्भ तारामंडल के बहुत धुंधले तारों का एक घेरा, जिनमें सदाकबिया सबसे जाना-पहचाना है, शतभिषा है; प्रतीक भी खाली घेरा है। मराठी में इसका नाम शततारका है, यानी सौ तारे।

देवता वरुण जल के देवता हैं। कृष्ण पक्ष की एक ख़ास त्रयोदशी पर शतभिषा नक्षत्र पड़े, तो उस मेल को वरुणी योग कहते हैं, और कई परिवार उस दिन गंगा स्नान करते हैं।

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पूर्वा भाद्रपदा

“भद्र पैरों में पहले”

क्रम
27 में से 25
राशि
कुम्भ 1–3; मीन 4
स्वामी
गुरु
देवता
अज एकपाद
प्रतीक
अर्थी के आगे के पाए, या तलवार
तारे
मार्कब और शीट (पेगासस तारामंडल)
गण
मनुष्य
योनि
सिंह (नर)
नाड़ी
आदि
वृक्ष
आम

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 से कुम्भ
  2. चरण 2 सो कुम्भ
  3. चरण 3 दा कुम्भ
  4. चरण 4 दी मीन

सर्दियों की शुरुआत की शामों में पेगासस तारामंडल का बड़ा चौकोर आसानी से दिखता है। उसके दो तारे, मार्कब और शीट, पूर्वा भाद्रपदा हैं, और बाक़ी दो उत्तरा भाद्रपदा: चारों मिलकर खाट के चार पाए।

देवता अज एकपाद, यानी एक पैर वाले अज, रुद्र का रूप माने जाते हैं। भाद्रपद महीने का नाम दोनों भाद्रपदाओं से है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

उत्तरा भाद्रपदा

“भद्र पैरों में बाद वाले”

क्रम
27 में से 26
राशि
मीन, चरण 1–4
स्वामी
शनि
देवता
अहिर्बुध्न्य
प्रतीक
अर्थी के पीछे के पाए, या जुड़वाँ
तारे
अल्जेनिब और अल्फ़ेराट्ज़ (पेगासस और एंड्रोमेडा तारामंडल)
गण
मनुष्य
योनि
गौ (मादा)
नाड़ी
मध्य
वृक्ष
नीम

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 दू मीन
  2. चरण 2 थ मीन
  3. चरण 3 झ मीन
  4. चरण 4 ञ मीन

पेगासस के चौकोर के बाक़ी दो कोने, अल्जेनिब और अल्फ़ेराट्ज़, उत्तरा भाद्रपदा हैं; अल्फ़ेराट्ज़ असल में एंड्रोमेडा तारामंडल का तारा है।

देवता अहिर्बुध्न्य हैं, यानी गहरे जल के सर्प। वेदों में उनका और पूर्वा भाद्रपदा के अज एकपाद का नाम अक्सर साथ आता है।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

रेवती

“समृद्ध”

क्रम
27 में से 27
राशि
मीन, चरण 1–4
स्वामी
बुध
देवता
पूषा
प्रतीक
मछलियों का जोड़ा, या ढोल
तारे
ज़ीटा पिसियम (मीन तारामंडल)
गण
देव
योनि
गज (मादा)
नाड़ी
अंत्य
वृक्ष
महुआ

चरण और उनके अक्षर

  1. चरण 1 दे मीन
  2. चरण 2 दो मीन
  3. चरण 3 चा मीन
  4. चरण 4 ची मीन

मीन तारामंडल का धुंधला तारा ज़ीटा पिसियम रेवती है, जो साफ़ आसमान में ही दिखता है। रेवती के साथ नक्षत्रों का चक्र पूरा होता है, और उसके बाद फिर अश्विनी।

देवता पूषा वेदों में राहों और यात्रियों के देवता हैं, जो भटके पशुओं को भी घर लौटाते हैं।

↑ नक्षत्रों की सूची पर लौटें

गण, योनि और नाड़ी: गुण मिलान के तीन कूट

हर नक्षत्र के साथ उसका गण, योनि और नाड़ी लिखे हैं। ये गुण मिलान के आठ कूटों में से तीन हैं: गण तीन समूहों के नाम हैं, देव, मनुष्य और राक्षस; योनि एक पशु है; और नाड़ी आदि, मध्य या अंत्य। विवाह की बात चलने पर कई परिवार परंपरा से दो जन्म नक्षत्रों के ये कूट मिलाकर देखते हैं।

यह पेज किसी जोड़ी के बारे में कोई फ़ैसला या अंक नहीं बताता। दो जन्म विवरण साथ रखकर देखने हों, तो ऐप का गुण मिलान टूल खोलें।

जहाँ परंपराएँ अलग हैं

पुरानी सूचियों में अभिजित को मिलाकर 28 नक्षत्र हैं; आज के पंचांग 27 गिनते हैं। कुछ देवता भी सूची-सूची में बदलते हैं: हस्त के सविता या सूर्य, रोहिणी के ब्रह्मा या प्रजापति। प्रतीक और वृक्ष भी अलग मिलते हैं, जैसे ज्येष्ठा का छत्र या कुंडल, और केरल की सूची में 7 नक्षत्रों के वृक्ष दूसरे हैं।

चरणों के अक्षर इलाक़े के हिसाब से थोड़े बदलते हैं, इसलिए जो सूची आपके परिवार में चलती है, उसे भी देखें। वर्तनी भी अलग है: हिंदी में शतभिषा, मूल, मृगशिरा और स्वाति, तो मराठी में शततारका, मूळ, मृगशीर्ष और स्वाती।

एक नज़र में सारे नक्षत्र

27 नक्षत्र: स्वामी ग्रह, चरणों की राशि और चारों चरणों के अक्षर
नक्षत्रस्वामीराशिअक्षर
अश्विनीकेतुमेष, चरण 1–4चू · चे · चो · ला
भरणीशुक्रमेष, चरण 1–4ली · लू · ले · लो
कृत्तिकासूर्यमेष 1; वृषभ 2–4अ · ई · उ · ए
रोहिणीचंद्रवृषभ, चरण 1–4ओ · वा · वी · वू
मृगशिरामंगलवृषभ 1–2; मिथुन 3–4वे · वो · का · की
आर्द्राराहुमिथुन, चरण 1–4कू · घ · ङ · छ
पुनर्वसुगुरुमिथुन 1–3; कर्क 4के · को · हा · ही
पुष्यशनिकर्क, चरण 1–4हू · हे · हो · डा
आश्लेषाबुधकर्क, चरण 1–4डी · डू · डे · डो
मघाकेतुसिंह, चरण 1–4मा · मी · मू · मे
पूर्वा फाल्गुनीशुक्रसिंह, चरण 1–4मो · टा · टी · टू
उत्तरा फाल्गुनीसूर्यसिंह 1; कन्या 2–4टे · टो · पा · पी
हस्तचंद्रकन्या, चरण 1–4पू · ष · ण · ठ
चित्रामंगलकन्या 1–2; तुला 3–4पे · पो · रा · री
स्वातिराहुतुला, चरण 1–4रू · रे · रो · ता
विशाखागुरुतुला 1–3; वृश्चिक 4ती · तू · ते · तो
अनुराधाशनिवृश्चिक, चरण 1–4ना · नी · नू · ने
ज्येष्ठाबुधवृश्चिक, चरण 1–4नो · या · यी · यू
मूलकेतुधनु, चरण 1–4ये · यो · भा · भी
पूर्वाषाढाशुक्रधनु, चरण 1–4भू · धा · फा · ढा
उत्तराषाढासूर्यधनु 1; मकर 2–4भे · भो · जा · जी
श्रवणचंद्रमकर, चरण 1–4जू / खी · खू · खे · खो
धनिष्ठामंगलमकर 1–2; कुम्भ 3–4गा · गी · गू · गे
शतभिषाराहुकुम्भ, चरण 1–4गो · सा · सी · सू
पूर्वा भाद्रपदागुरुकुम्भ 1–3; मीन 4से · सो · दा · दी
उत्तरा भाद्रपदाशनिमीन, चरण 1–4दू · थ · झ · ञ
रेवतीबुधमीन, चरण 1–4दे · दो · चा · ची

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नक्षत्र क्या है?

नक्षत्र चंद्रमा के मार्ग के 27 बराबर हिस्सों में से एक है, हर हिस्सा 13°20′ का, और हर एक का नाम किसी तारे या तारा-समूह पर है। चंद्रमा हर नक्षत्र में लगभग एक दिन रहता है, इसलिए पंचांग हर दिन का नक्षत्र बताता है।

अपना जन्म नक्षत्र कैसे जानें?

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका जन्म नक्षत्र है। इसके लिए जन्म की तारीख़, समय और जगह चाहिए: साइन इन करके इन्हें ऐप के जन्म नक्षत्र टूल में डालें, वह नक्षत्र और चरण बताएगा।

नक्षत्र का चरण क्या होता है?

हर नक्षत्र के चार बराबर हिस्से हैं, जिन्हें चरण या पाद कहते हैं; पूरे चक्र में 108 चरण हैं और हर राशि में नौ। हर चरण का अपना एक अक्षर भी है, जो बच्चे का नाम रखने में काम आता है।

नक्षत्र के अक्षर से बच्चे का नाम कैसे रखा जाता है?

परंपरा में नामकरण के समय देखा जाता है कि जन्म के समय चंद्रमा किस नक्षत्र के किस चरण में था, और नाम उस चरण के अक्षर से शुरू रखा जाता है। जैसे रोहिणी के पहले चरण का अक्षर ‘ओ’ है। अपने बच्चे का चरण और उसके अक्षर ऐप के बच्चे के नाम वाले टूल में देखें।

नक्षत्र सत्ताईस क्यों हैं, और कभी अट्ठाईस क्यों गिने जाते हैं?

चंद्रमा तारों के बीच अपना एक चक्कर लगभग 27⅓ दिन में पूरा करता है, और परंपरा उसके मार्ग को 27 पड़ावों में बाँटती है, लगभग एक दिन का एक पड़ाव। अथर्ववेद जैसी पुरानी सूचियों में उत्तराषाढा और श्रवण के बीच अभिजित भी गिना गया है, जिससे संख्या 28 होती है; आज के पंचांग 27 नक्षत्र गिनते हैं।

आज का नक्षत्र, भाग्य कार्ड ऐप में

मुफ़्त भाग्य कार्ड ऐप, वेब पर और फ़ोन पर, हर दिन का पंचांग दिखाता है, और उसके साथ जन्म नक्षत्र, बच्चे के नाम और गुण मिलान जैसे टूल भी।

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