नक्षत्र आकाश के उन 27 बराबर हिस्सों में से एक है जिनसे होकर चंद्रमा गुज़रता है; हर हिस्सा 13°20′ का है। चंद्रमा लगभग 27⅓ दिन में सारे नक्षत्र पार करता है, यानी हर नक्षत्र में क़रीब एक दिन। पंचांग हर दिन का नक्षत्र बताता है, और जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका जन्म नक्षत्र है।
लेखक: यंत्र गुरु, भाग्य कार्ड्स का संपादकीय विभाग · अपडेट:
चंद्रमा और सूर्य का मार्ग एक घेरा है, जिसे परंपरा दो तरह से बाँटती है: 12 राशियों में और 27 नक्षत्रों में। दोनों बँटवारे चरणों पर आकर मिलते हैं, क्योंकि हर राशि में ठीक नौ चरण आते हैं।
बाहरी घेरा 12 राशियाँ हैं, भीतरी घेरा 27 नक्षत्र; हर निशान एक चरण है, और नौ चरणों से एक राशि बनती है।
नक्षत्र क्या है
परंपरा में चंद्रमा के मार्ग को 27 पड़ावों में बाँटा गया है, और हर पड़ाव का नाम उसके पास चमकते किसी तारे या तारा-समूह पर है। चंद्रमा रोज़ लगभग एक नक्षत्र आगे बढ़ता है, इसलिए हर रात उसके पास कोई और तारा होता है।
तिथि, वार, योग और करण के साथ नक्षत्र पंचांग के पाँच अंगों में से एक है; आज का नक्षत्र आज के पंचांग में देखें। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वह आपका जन्म नक्षत्र है, और उसे आप ऐप के जन्म नक्षत्र टूल में जान सकते हैं।
हर नक्षत्र के चार चरण, हर राशि में नौ
हर नक्षत्र चार बराबर चरणों में बँटा है, इसलिए पूरे चक्र में 108 चरण हैं, और हर राशि में नौ, यानी सवा दो नक्षत्र। इसी से कुछ नक्षत्र दो राशियों की सीमा पर पड़ते हैं: कृत्तिका का पहला चरण मेष में है और बाक़ी तीन वृषभ में।
परंपरा में हर चरण का एक अक्षर है, और नामकरण संस्कार में बच्चे का नाम अक्सर जन्म नक्षत्र के चरण वाले अक्षर से शुरू किया जाता है। जन्म की तारीख़, समय और जगह से ऐप का बच्चे के नाम वाला टूल नक्षत्र, चरण और उसके अक्षर बताता है।
नक्षत्रों के नाम पर बारह महीने
चांद्र महीनों के नाम नक्षत्रों से आए हैं: जिस महीने की पूर्णिमा पर चंद्रमा जिस नक्षत्र में या उसके पास होता है, महीना उसी के नाम पर है। चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ, पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा से आषाढ़, श्रवण से श्रावण, दोनों भाद्रपदाओं से भाद्रपद।
अश्विनी से आश्विन, कृत्तिका से कार्तिक, मृगशिरा से मार्गशीर्ष, पुष्य से पौष, मघा से माघ, और दोनों फाल्गुनियों से फाल्गुन। हर बार पूर्णिमा ठीक उसी नक्षत्र में हो, यह ज़रूरी नहीं; कई बार वह पड़ोस के नक्षत्र में पड़ती है।
नक्षत्रों की कथाएँ
पुराणों की कथा में 27 नक्षत्र दक्ष प्रजापति की बेटियाँ हैं, जिनका विवाह चंद्र से हुआ, पर चंद्र का मन रोहिणी में ही रमा। बहनों की शिकायत पर दक्ष के शाप से चंद्र क्षीण होने लगे, और प्रभास तीर्थ में, जहाँ आज सोमनाथ है, भगवान शिव की कृपा से शाप हल्का हुआ। परंपरा एक पखवाड़ा घटता और एक पखवाड़ा बढ़ता चंद्रमा इसी कथा से समझाती है।
कृत्तिका की छह बहनों ने स्कंद को पाला, इसी से वे कार्तिकेय हुए। अथर्ववेद की सूची में उत्तराषाढा और श्रवण के बीच 28वाँ नक्षत्र अभिजित है, जिसके तारे को पश्चिम में वेगा कहते हैं।
मेष तारामंडल के सिर पर दो पास-पास तारे, मेढ़े के सींगों की तरह, अश्विनी की पहचान हैं। आज की सूची अश्विनी से शुरू होती है, और आश्विन महीने का नाम इसी से आया है।
देवता अश्विनी कुमार जुड़वाँ भाई हैं। पुराणों की कथा में वे सूर्य और संज्ञा के पुत्र हैं, जब संज्ञा घोड़ी के रूप में थीं। नक्षत्र के नाम और प्रतीक, दोनों में भी घोड़ा है।
वृषभ तारामंडल में छह-सात तारों का छोटा-सा झुंड, जिसे पश्चिम में प्लीएडीज़ कहते हैं, आकाश के सबसे जाने-पहचाने तारा-समूहों में से एक है। वेदों के समय की नक्षत्र-सूची कृत्तिका से शुरू होती थी, अश्विनी से नहीं।
कार्तिक महीने का नाम कृत्तिका से है। कार्तिक पूर्णिमा पर चंद्रमा कृत्तिका में हो, तो कई परिवार कार्तिकस्वामी दर्शन के लिए कार्तिकेय के मंदिर जाते हैं; उनकी कथा ऊपर कथाओं में है।
साफ़ और अँधेरे आसमान में ज़्यादातर लोग कृत्तिका में छह तारे गिन पाते हैं, और परंपरा में भी कृत्तिकाएँ छह हैं।
वृषभ तारामंडल का नारंगी-लाल तारा अल्डेबरान रोहिणी है, और नाम का अर्थ भी लाल है। आकाश में इसके लगभग ठीक सामने ज्येष्ठा का लाल तारा एंटारेस है, इसलिए दोनों एक साथ रात में नहीं दिखते।
कथा में रोहिणी चंद्र की सबसे प्रिय पत्नी हैं। भागवत परंपरा में श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ, इसलिए जन्माष्टमी पर रोहिणी का भी ध्यान रखा जाता है।
उत्तर भारत में सूर्य के रोहिणी में आने के बाद के नौ दिनों को नौतपा कहते हैं, जो परंपरा में गर्मी के सबसे तीखे दिन गिने जाते हैं।
ओरायन तारामंडल के सिर पर तीन मद्धम तारों का छोटा त्रिकोण मृगशिरा है, और परंपरा पूरे ओरायन में एक हिरण देखती है। पास ही आकाश का सबसे चमकीला तारा सीरियस है, जिसका एक संस्कृत नाम मृगव्याध है, यानी हिरण का शिकारी।
मार्गशीर्ष महीने का नाम मृगशिरा से है। सूर्य के मृगशिरा में आने से वर्षा के नक्षत्र गिने जाने लगते हैं, और महाराष्ट्र के किसान ‘मृग’ के दिनों में मानसून की राह देखते हैं।
मृगशिरा से स्वाति तक के ग्यारह नक्षत्र वर्षा के नक्षत्र माने जाते हैं। सूर्य जब इनमें से किसी में आता है, कैलेंडर वह दिन लिखता है, और किसान उसी हिसाब से बारिश की राह देखते हैं।
मिथुन तारामंडल के दो चमकीले तारे, कैस्टर और पोलक्स, अगल-बगल दिखते हैं; जोड़ी इतनी साफ़ है कि पश्चिम में भी इन्हें जुड़वाँ भाई माना गया। यही पुनर्वसु हैं।
वाल्मीकि रामायण में प्रभु श्रीराम का जन्म उस नक्षत्र में बताया गया है जिसकी देवता अदिति हैं, यानी पुनर्वसु। सूर्य के पुनर्वसु में रहते भी बारिश की आस रहती है।
कर्क तारामंडल के दो मद्धम तारों के बीच, अँधेरी रात में, धुएँ जैसा एक धब्बा दिखता है, जो तारों का एक झुंड है। पुष्य इसी हिस्से में है, और पौष का नाम इसी से है।
देवता बृहस्पति हैं, और गुरुवार भी उन्हीं का वार है। गुरुवार को पुष्य हो, तो इसे गुरु पुष्यामृत योग कहते हैं; उस दिन कई परिवार सोना-चाँदी ख़रीदते हैं। सूर्य के पुष्य में रहते भी बारिश की आस रहती है।
हाइड्रा तारामंडल के सिर के मद्धम तारे एक छोटे घेरे में हैं; यही आश्लेषा है। हाइड्रा का अर्थ है पानी का साँप, यानी पश्चिम ने भी यहाँ साँप ही देखा, और परंपरा में आश्लेषा के देवता सर्प हैं।
नाम का भाव है लिपटना, जैसे साँप किसी डाल से लिपट जाता है। सूर्य के आश्लेषा में रहते भी बारिश की आस रहती है।
सिंह तारामंडल का सबसे चमकीला तारा रेगुलस मघा है, और वह सूर्य के मार्ग पर लगभग ठीक बैठा है। लैटिन में रेगुलस का अर्थ है छोटा राजा, और मघा का प्रतीक राजसिंहासन है।
मघा के देवता पितृ हैं, और पितृ पक्ष में मघा नक्षत्र के दिन कई परिवार मघा श्राद्ध करते हैं। माघ महीने का नाम मघा से है, और सूर्य के मघा में रहते बारिश की आस बनी रहती है।
सिंह तारामंडल के पिछले हिस्से में चार तारे एक चौकोर बनाते हैं, जैसे पलंग के चार पाए। आगे के दो पाए पूर्वा फाल्गुनी हैं और पीछे के दो उत्तरा फाल्गुनी, और फाल्गुन महीने का नाम इन्हीं से है।
भग का अर्थ ही हिस्सा है, और वेदों में वे हर किसी को उसका हिस्सा बाँटने वाले देवता हैं। सूर्य के पूर्वा फाल्गुनी में रहते भी बारिश की आस रहती है।
सिंह की पूँछ का तारा डेनेबोला उत्तरा फाल्गुनी है; अरबी में डेनेबोला का अर्थ ही शेर की पूँछ है। महाभारत में अर्जुन कहते हैं कि उनका जन्म उत्तरा फाल्गुनी में हुआ, इसीलिए उनका एक नाम फाल्गुन है।
देवता अर्यमा वेदों में मित्रता, अतिथि-सत्कार और विवाह के बंधन से जुड़े हैं। सूर्य के उत्तरा फाल्गुनी में रहते बारिश की आस रहती है।
कॉर्वस तारामंडल के पाँच तारे एक खुली हथेली की तरह दिखते हैं, जैसे पाँच उँगलियाँ। उत्तर भारत में बोलचाल में इसे हथिया कहते हैं, और हथिया की बारिश को गर्मी की विदाई माना जाता है।
देवता सविता सूर्य का एक रूप हैं। सामवेद की परंपरा वाले परिवार श्रावणी उपाकर्म, यानी जनेऊ बदलने और वेदपाठ के नए आरंभ का दिन, हस्त नक्षत्र पर मनाते हैं।
कन्या तारामंडल का चमकीला, नीला-सफ़ेद तारा स्पाइका चित्रा है। आज की नक्षत्र-गणना में चक्र का आरंभ, यानी अश्विनी का पहला बिंदु, चित्रा के ठीक सामने माना जाता है।
चैत्र महीने का नाम चित्रा से है। देवता त्वष्टा देवताओं के शिल्पी हैं, और सूर्य के चित्रा में रहते वर्षा के आख़िरी दिनों की आस रहती है।
उत्तरी आकाश का सबसे चमकीला तारा, नारंगी आर्कटुरस, स्वाति है। यह आसपास के तारों से अलग, अकेला चमकता दिखता है, और नाम का एक अर्थ स्वतंत्र भी है।
कवियों की परंपरा में स्वाति की बूँद सीप में गिरे तो मोती बनती है, और केले में गिरे तो कपूर; रहीम का एक दोहा इसी पर है। वर्षा के ग्यारह नक्षत्रों में स्वाति आख़िरी है, जिसके बाद बारिश की आस थमने लगती है।
तुला तारामंडल के दो तारे विशाखा हैं, जैसे एक डाल की दो शाखाएँ। अरबी में इनके नामों का अर्थ है दक्षिणी पंजा और उत्तरी पंजा, यानी वहाँ भी यह जोड़ी दो हिस्सों में बँटी है।
देवता इंद्र और अग्नि, दो देव एक साथ हैं। वैशाख महीने का नाम विशाखा से है, क्योंकि उस महीने की पूर्णिमा का चंद्रमा इसी के आसपास रहता है।
वृश्चिक की मुड़ी हुई पूँछ और डंक के तारे, लगभग, मूल हैं। नाम का अर्थ जड़ है, और प्रतीक भी जड़ों का गुच्छा है।
नवरात्रि में मूल नक्षत्र के दिन माँ सरस्वती का आवाहन होता है, और कई घरों में इन दिनों किताबें और पोथियाँ सरस्वती के आगे रखी जाती हैं। ज्येष्ठागौरी का विसर्जन भी मूल पर होता है।
गरुड़ तारामंडल में चमकीला अल्टेयर और उसके दोनों ओर एक-एक तारा, लगभग सीधी पंक्ति में, श्रवण हैं। परंपरा इन तीन तारों में वामन के तीन पग देखती है, और श्रवण के देवता विष्णु हैं।
श्रावण महीने का नाम श्रवण से है, और ऋग्वेद की परंपरा वाले परिवारों का श्रावणी उपाकर्म इसी नक्षत्र पर होता है। नवरात्रि में सरस्वती विसर्जन भी श्रवण पर होता है।
केरल का ओणम तिरुवोणम के दिन मनाया जाता है, जो श्रवण का ही मलयालम नाम है; ओणम वामन और राजा महाबली की कथा से जुड़ा है।
डॉल्फ़िनस के चार तारे, लगभग, एक छोटा चौकोर बनाते हैं; यही धनिष्ठा है, जिसका पुराना नाम श्रविष्ठा है। ज्योतिष के सबसे पुराने ग्रंथ वेदांग ज्योतिष में उत्तरायण का आरंभ श्रविष्ठा के आरंभ पर बताया गया है।
देवता आठ वसु हैं। महाभारत में भीष्म आठ वसुओं में से एक का अवतार हैं, गंगा के आठवें पुत्र।
कुम्भ तारामंडल के बहुत धुंधले तारों का एक घेरा, जिनमें सदाकबिया सबसे जाना-पहचाना है, शतभिषा है; प्रतीक भी खाली घेरा है। मराठी में इसका नाम शततारका है, यानी सौ तारे।
देवता वरुण जल के देवता हैं। कृष्ण पक्ष की एक ख़ास त्रयोदशी पर शतभिषा नक्षत्र पड़े, तो उस मेल को वरुणी योग कहते हैं, और कई परिवार उस दिन गंगा स्नान करते हैं।
सर्दियों की शुरुआत की शामों में पेगासस तारामंडल का बड़ा चौकोर आसानी से दिखता है। उसके दो तारे, मार्कब और शीट, पूर्वा भाद्रपदा हैं, और बाक़ी दो उत्तरा भाद्रपदा: चारों मिलकर खाट के चार पाए।
देवता अज एकपाद, यानी एक पैर वाले अज, रुद्र का रूप माने जाते हैं। भाद्रपद महीने का नाम दोनों भाद्रपदाओं से है।
मीन तारामंडल का धुंधला तारा ज़ीटा पिसियम रेवती है, जो साफ़ आसमान में ही दिखता है। रेवती के साथ नक्षत्रों का चक्र पूरा होता है, और उसके बाद फिर अश्विनी।
देवता पूषा वेदों में राहों और यात्रियों के देवता हैं, जो भटके पशुओं को भी घर लौटाते हैं।
हर नक्षत्र के साथ उसका गण, योनि और नाड़ी लिखे हैं। ये गुण मिलान के आठ कूटों में से तीन हैं: गण तीन समूहों के नाम हैं, देव, मनुष्य और राक्षस; योनि एक पशु है; और नाड़ी आदि, मध्य या अंत्य। विवाह की बात चलने पर कई परिवार परंपरा से दो जन्म नक्षत्रों के ये कूट मिलाकर देखते हैं।
यह पेज किसी जोड़ी के बारे में कोई फ़ैसला या अंक नहीं बताता। दो जन्म विवरण साथ रखकर देखने हों, तो ऐप का गुण मिलान टूल खोलें।
जहाँ परंपराएँ अलग हैं
पुरानी सूचियों में अभिजित को मिलाकर 28 नक्षत्र हैं; आज के पंचांग 27 गिनते हैं। कुछ देवता भी सूची-सूची में बदलते हैं: हस्त के सविता या सूर्य, रोहिणी के ब्रह्मा या प्रजापति। प्रतीक और वृक्ष भी अलग मिलते हैं, जैसे ज्येष्ठा का छत्र या कुंडल, और केरल की सूची में 7 नक्षत्रों के वृक्ष दूसरे हैं।
चरणों के अक्षर इलाक़े के हिसाब से थोड़े बदलते हैं, इसलिए जो सूची आपके परिवार में चलती है, उसे भी देखें। वर्तनी भी अलग है: हिंदी में शतभिषा, मूल, मृगशिरा और स्वाति, तो मराठी में शततारका, मूळ, मृगशीर्ष और स्वाती।
एक नज़र में सारे नक्षत्र
27 नक्षत्र: स्वामी ग्रह, चरणों की राशि और चारों चरणों के अक्षर
नक्षत्र चंद्रमा के मार्ग के 27 बराबर हिस्सों में से एक है, हर हिस्सा 13°20′ का, और हर एक का नाम किसी तारे या तारा-समूह पर है। चंद्रमा हर नक्षत्र में लगभग एक दिन रहता है, इसलिए पंचांग हर दिन का नक्षत्र बताता है।
अपना जन्म नक्षत्र कैसे जानें?
जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका जन्म नक्षत्र है। इसके लिए जन्म की तारीख़, समय और जगह चाहिए: साइन इन करके इन्हें ऐप के जन्म नक्षत्र टूल में डालें, वह नक्षत्र और चरण बताएगा।
नक्षत्र का चरण क्या होता है?
हर नक्षत्र के चार बराबर हिस्से हैं, जिन्हें चरण या पाद कहते हैं; पूरे चक्र में 108 चरण हैं और हर राशि में नौ। हर चरण का अपना एक अक्षर भी है, जो बच्चे का नाम रखने में काम आता है।
नक्षत्र के अक्षर से बच्चे का नाम कैसे रखा जाता है?
परंपरा में नामकरण के समय देखा जाता है कि जन्म के समय चंद्रमा किस नक्षत्र के किस चरण में था, और नाम उस चरण के अक्षर से शुरू रखा जाता है। जैसे रोहिणी के पहले चरण का अक्षर ‘ओ’ है। अपने बच्चे का चरण और उसके अक्षर ऐप के बच्चे के नाम वाले टूल में देखें।
नक्षत्र सत्ताईस क्यों हैं, और कभी अट्ठाईस क्यों गिने जाते हैं?
चंद्रमा तारों के बीच अपना एक चक्कर लगभग 27⅓ दिन में पूरा करता है, और परंपरा उसके मार्ग को 27 पड़ावों में बाँटती है, लगभग एक दिन का एक पड़ाव। अथर्ववेद जैसी पुरानी सूचियों में उत्तराषाढा और श्रवण के बीच अभिजित भी गिना गया है, जिससे संख्या 28 होती है; आज के पंचांग 27 नक्षत्र गिनते हैं।
आज का नक्षत्र, भाग्य कार्ड ऐप में
मुफ़्त भाग्य कार्ड ऐप, वेब पर और फ़ोन पर, हर दिन का पंचांग दिखाता है, और उसके साथ जन्म नक्षत्र, बच्चे के नाम और गुण मिलान जैसे टूल भी।