ज्योतिष के नौ ग्रह

नवग्रह: नौ ग्रह, उनके वार और बीज मंत्र

ज्योतिष के नौ ग्रहों को नवग्रह कहते हैं: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, और दो छाया ग्रह, राहु और केतु। पहले सात ग्रहों के नाम पर हफ़्ते के सात वार हैं, और परंपरा में हर ग्रह का अपना बीज मंत्र है। नीचे हर ग्रह का वार, मंत्र, आकाश में उसकी पहचान और उसकी कथा है।

नौ ग्रह, एक नज़र में

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सूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतु

सात वार, सात ग्रह

हफ़्ते के सातों वार सात ग्रहों के नाम पर हैं: रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। रवि सूर्य का ही नाम है, और सोम चंद्रमा का।

ज्योतिष यह क्रम होरा से समझाता है: दिन का हर घंटा, यानी होरा, बारी-बारी से एक ग्रह का होता है, सबसे धीमे शनि से सबसे तेज़ चंद्रमा तक। जिस ग्रह की होरा से दिन शुरू होता है, दिन उसी का है, और इसी गिनती से रविवार के बाद सोमवार आता है। राहु और केतु का अपना कोई वार नहीं।

सूर्य

सूरज

वार
रविवार
बीज मंत्र
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
इनकी राशियाँ
सिंह

ज्योतिष में सूर्य एक साल में बारहों राशियों से होकर गुज़रते हैं, और हर राशि में उनके प्रवेश को संक्रांति कहते हैं। मकर राशि में उनका प्रवेश ही मकर संक्रांति है, जो घर-घर में तिल-गुड़ के साथ मनाई जाती है।

पुराणों में सूर्य देव सात घोड़ों वाले रथ पर आकाश पार करते हैं, और उनके सारथी अरुण हैं, भोर की लालिमा के देवता। शनि देव और यम, दोनों उन्हीं के पुत्र हैं।

बहुत से घरों में दिन की शुरुआत उगते सूरज को ताँबे के लोटे से जल चढ़ाकर होती है; इसे अर्घ्य कहते हैं। छठ पूजा और रथ सप्तमी सूर्य देव के ही पर्व हैं।

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चंद्र

चाँद

वार
सोमवार
बीज मंत्र
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः
इनकी राशियाँ
कर्क
इनके नक्षत्र
रोहिणी, हस्त, श्रवण

चंद्रमा लगभग 27 दिन में सभी 27 नक्षत्रों से होकर आकाश का पूरा चक्कर लगाते हैं, यानी हर नक्षत्र में लगभग एक दिन। वैदिक ज्योतिष में आपकी राशि वही है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा थे, और आपका जन्म नक्षत्र भी उसी पल का उनका नक्षत्र है।

पुराणों की कथा है कि दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियाँ, यानी 27 नक्षत्र, चंद्रमा से ब्याही गईं, पर चंद्रमा का मन रोहिणी में ही रमता था। बहनों की शिकायत पर दक्ष के शाप से वे घटने लगे, और देवताओं की विनती पर शाप बदला: अब वे एक पक्ष घटते हैं और एक पक्ष बढ़ते हैं। परंपरा सोमनाथ को वही जगह मानती है जहाँ चंद्रमा ने शिव की आराधना की थी।

सोमवार का नाम चंद्रमा के ही एक नाम, सोम, से पड़ा है।

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मंगल

लाल ग्रह

वार
मंगलवार
बीज मंत्र
ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
इनकी राशियाँ
मेष, वृश्चिक

रात के आकाश में मंगल अपने लाल रंग से अलग पहचाने जाते हैं। इसीलिए उनके नामों में लोहित, यानी लाल, और अंगारक, यानी अंगारे जैसे, भी हैं।

बीज मंत्र में उनका नाम भौम है, यानी भूमि के पुत्र, और उनके एक और नाम कुज का अर्थ है धरती से जन्मे। उनके जन्म की कथाएँ अलग-अलग हैं: किसी में वे भूमि देवी और भगवान विष्णु के पुत्र हैं, किसी में शिव के पसीने की एक बूँद से जन्मे, जिन्हें धरती माता ने पाला।

मंगलवार को बहुत से घरों में श्री हनुमान की पूजा होती है। केतु की साधना भी परंपरा से इसी दिन की जाती है।

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बुध

सूरज के सबसे पास का ग्रह

वार
बुधवार
बीज मंत्र
ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
इनकी राशियाँ
मिथुन, कन्या

बुध सूरज के सबसे पास के ग्रह हैं, इसलिए वे कभी सूरज से दूर नहीं दिखते: बस भोर से ठीक पहले या साँझ ढलने के बाद, क्षितिज के पास, थोड़ी देर के लिए।

बुध शब्द का अर्थ है जानने वाला, ज्ञानी। पुराणों में बुध चंद्रमा के पुत्र हैं; ज़्यादातर कथाओं में उनकी माता तारा हैं, पर कुछ सूचियों में रोहिणी। बुध और इला के पुत्र पुरूरवा से चंद्रवंश की शुरुआत मानी जाती है।

बुधवार बुध का वार है, और परंपरा में बुध वाणी, लेखन और व्यापार से जोड़े जाते हैं।

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गुरु

बृहस्पति, सबसे बड़ा ग्रह

वार
गुरुवार
बीज मंत्र
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
इनकी राशियाँ
धनु, मीन

रात के आकाश में शुक्र के बाद अक्सर सबसे चमकीले ग्रह बृहस्पति ही होते हैं। वे लगभग 12 साल में बारहों राशियों का चक्कर पूरा करते हैं, यानी हर राशि में लगभग एक साल।

गुरु शब्द का एक अर्थ है भारी, और संयोग से बृहस्पति सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह भी हैं। पुराणों में बृहस्पति अंगिरा ऋषि के पुत्र और देवताओं के गुरु हैं; इसीलिए गुरुवार को बृहस्पतिवार भी कहते हैं।

उत्तर भारत के बहुत से घरों में गुरुवार को पीले कपड़े पहने जाते हैं, पीली चीज़ें चढ़ाई जाती हैं और केले के पेड़ की पूजा होती है।

नासिक और उज्जैन का सिंहस्थ कुंभ तब होता है जब गुरु सिंह राशि में होते हैं, इसलिए यह लगभग हर 12 साल में लौटता है।

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शुक्र

भोर का तारा

वार
शुक्रवार
बीज मंत्र
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः
इनकी राशियाँ
वृषभ, तुला

आकाश में चंद्रमा के बाद सबसे चमकीले शुक्र ही हैं: कभी भोर से पहले पूरब में, कभी साँझ ढलते पश्चिम में। इसीलिए लोग इन्हें भोर का तारा और साँझ का तारा कहते हैं, जबकि वे तारा नहीं, ग्रह हैं।

शुक्र शब्द का अर्थ है उजला, चमकीला। पुराणों में शुक्र ही शुक्राचार्य हैं, असुरों के गुरु। वामन अवतार की कथा में उन्होंने वामन को पहचान लिया और राजा बलि को तीन पग भूमि का दान करने से रोकना चाहा, पर बलि अपने वचन से नहीं डिगे।

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शनि

सबसे धीमी चाल का ग्रह

वार
शनिवार
बीज मंत्र
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
इनकी राशियाँ
मकर, कुम्भ

आँखों से दिखने वाले ग्रहों में शनि सबसे धीमे हैं: एक राशि पार करने में लगभग ढाई साल, और बारहों राशियों का चक्कर पूरा करने में लगभग 30 साल। उनका नाम शनैश्चर भी इसी से है, यानी धीरे-धीरे चलने वाले।

पुराणों में शनि सूर्य देव और छाया के पुत्र हैं। छाया सूर्य की पत्नी संज्ञा की छाया से बनी थीं, और यम और यमुना शनि के भाई-बहन हैं।

शनिवार को बहुत से भक्त शनि देव को तेल चढ़ाते हैं और हनुमान मंदिर में दर्शन करते हैं। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में शनि देव का काला शिला-रूप बिना छत के, खुले चबूतरे पर विराजता है।

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राहु

छाया ग्रह, चंद्रमा का उत्तरी पात

वार
अपना कोई वार नहीं
बीज मंत्र
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
इनके नक्षत्र
आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा

राहु आकाश का कोई पिंड नहीं, एक बिंदु हैं: जहाँ चंद्रमा का मार्ग सूर्य के मार्ग को काटकर उत्तर की ओर जाता है। ग्रहण तभी होता है जब सूर्य और चंद्रमा ऐसे बिंदु के पास हों, और राहु उल्टी दिशा में चलकर लगभग 18 साल में राशियों का चक्कर पूरा करते हैं।

पुराणों की कथा है कि समुद्र मंथन के बाद भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत बाँट रहे थे, तभी स्वर्भानु नाम का एक असुर वेश बदलकर सूर्य और चंद्र के बीच जा बैठा। दोनों ने उसे पहचाना और सुदर्शन चक्र ने उसका सिर अलग कर दिया, पर अमृत गले से उतर चुका था। सिर राहु बना और धड़ केतु, और परंपरा में ग्रहण वह घड़ी है जब राहु सूर्य या चंद्रमा तक पहुँच जाते हैं।

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केतु

छाया ग्रह, चंद्रमा का दक्षिणी पात

वार
अपना कोई वार नहीं
बीज मंत्र
ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
इनके नक्षत्र
अश्विनी, मघा, मूल

केतु भी एक बिंदु हैं, चंद्रमा का दक्षिणी पात, और वे हमेशा राहु के ठीक सामने रहते हैं, यानी उनसे सातवीं राशि में।

केतु शब्द का अर्थ है ध्वज या पताका, और पुच्छल तारे को आज भी धूमकेतु, यानी धुएँ का ध्वज, कहते हैं। स्वर्भानु की कथा में केतु उसका धड़ हैं, और ज्योतिष उन्हें वैराग्य और मोक्ष से जोड़ता है।

बहुत से घरों में केतु की साधना मंगलवार को, मंगल के साथ होती है।

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घरों में ग्रह का वार कैसे रखा जाता है

परंपरा में किसी ग्रह की साधना उसके वार से शुरू होती है, हो सके तो सूर्योदय के समय। साफ़ जगह पर बैठकर घी का छोटा-सा दीया जलाएँ, एक फूल चढ़ाएँ, और ग्रह के बीज मंत्र का 108 बार जप करें, यानी एक माला। बहुत से लोग उस दिन व्रत भी रखते हैं।

ग्रह यंत्र कार्डों के साथ परंपरा एक लंबी साधना भी बताती है: कम से कम 40 दिन तक रोज़ 108 बार बीज मंत्र, और उसके बाद रोज़ 27 बार। कार्ड की शुरुआत के सात चरण यंत्र की शुरुआत कैसे करें में हैं।

कुंडली में और मंदिरों में नवग्रह

आपकी जन्म कुंडली आपके जन्म के पल का आकाश है: उसमें लिखा है कि उस समय नौ ग्रह किन राशियों में थे। उसे पढ़ना ज्योतिषी का काम है; यह पेज परंपरा बताता है, भविष्य नहीं।

बहुत से मंदिरों में नवग्रह एक चबूतरे पर साथ विराजते हैं, बीच में सूर्य और आठों दिशाओं में बाक़ी आठ, और भक्त उनकी परिक्रमा करते हैं। तमिलनाडु में कुंभकोणम के आसपास नौ मंदिर हैं, हर ग्रह का एक। गृह प्रवेश जैसी बड़ी पूजाओं में भी अक्सर नवग्रहों का पूजन होता है।

हर ग्रह के साथ कौन सा कार्ड

चंद्र, मंगल, बुध और केतु के अपने यंत्र कार्ड हैं; बाक़ी पाँच ग्रहों के आगे वह कार्ड है जिसे परंपरा उनके देवता या उनके वार के नाते उनसे जोड़ती है।

नवग्रह के बारे में आपके सवाल

नवग्रह क्या हैं?

ज्योतिष के नौ ग्रह: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, और दो छाया ग्रह, राहु और केतु। ग्रह शब्द का अर्थ है पकड़ने वाला, और ज्योतिष में यह नाम उन नौ के लिए है जिनकी चाल पंचांग और कुंडली में देखी जाती है। इसीलिए सूर्य, जो तारा हैं, और राहु-केतु, जो कोई पिंड ही नहीं, भी ग्रह गिने जाते हैं।

कौन सा वार किस ग्रह का है?

रविवार सूर्य का, सोमवार चंद्र का, मंगलवार मंगल का, बुधवार बुध का, गुरुवार गुरु का, शुक्रवार शुक्र का और शनिवार शनि का। परंपरा में किसी ग्रह की साधना उसी के वार से शुरू की जाती है।

बीज मंत्र क्या है, और घरों में इसका जप कैसे होता है?

बीज मंत्र ग्रह का छोटा मूल मंत्र है, जिसमें बीज अक्षरों के बाद ग्रह का नाम आता है; हर ग्रह का मंत्र ऊपर उसके हिस्से में है। परंपरा में जप ग्रह के वार से शुरू होता है, हो सके तो सूर्योदय के समय, और एक बार में 108 बार, यानी एक माला। ग्रह कार्ड के साथ परंपरा कम से कम 40 दिन रोज़ 108 बार, फिर रोज़ 27 बार जप रखती है।

राहु और केतु का अपना वार क्यों नहीं है?

सात वार उन सात ग्रहों के नाम पर हैं जो आकाश में दिखते हैं। राहु और केतु कोई पिंड नहीं, चंद्रमा के मार्ग के दो बिंदु हैं, इसलिए उनका अपना कोई वार नहीं। बहुत से घर राहु की साधना शनिवार को और केतु की मंगलवार को करते हैं।

किस ग्रह के साथ कौन सा कार्ड रखा जाता है?

चंद्र, मंगल, बुध और केतु के अपने यंत्र कार्ड हैं। सूर्य और गुरु के साथ गायत्री यंत्र कार्ड है, शुक्र के साथ महालक्ष्मी, शनि के साथ हनुमान और राहु के साथ दुर्गा यंत्र कार्ड; कार्डों की सूची में हर जोड़ी की वजह लिखी है।

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