पंचांग
वाराणसी का पंचांग, मंगलवार २ फ़रवरी 2027
आपने वाराणसी चुना है। इस पेज पर दिए समय और तारीखें उत्तर भारत क्षेत्र के लिए हैं, जिनकी गणना दिल्ली के लिए की गई है। वाराणसी में समय अलग हो सकता है, और कोई त्योहार किसी दूसरे दिन पड़ सकता है।
त्योहारों की इन तारीखों का मिलान अभी किसी छपे हुए पंचांग से नहीं किया गया है।
पंचांग के पाँच अंग और मास
- तिथि
- एकादशी (08:41:36 – 11:10:38)
- नक्षत्र
- ज्येष्ठा (06:27:37 – 09:21:15)
- योग
- व्याघात (16:55:39 – 17:46:45)
- करण
- बालव (21:54:06 – 11:10:38)
- वार
- मंगलवार (07:09:30 – 07:08:56)
- मास (अमांत)
- पौष
- मास (पूर्णिमांत)
- माघ
- पक्ष
- कृष्ण
- ऋतु
- हेमंत
- अयन
- उत्तरायण
- संवत्सर
- पराभव
- संवत
- विक्रम संवत 2083, शक संवत 1948
सूर्य और चंद्रमा
- सूर्योदय
- सूर्यास्त
- मध्याह्न
- चंद्रोदय
- चंद्रास्त
- चंद्र कला
- घटती चंद्रकला
- चंद्रमा का प्रकाशित भाग
- १८%
- चंद्र राशि
- वृश्चिक, तक
- सूर्य राशि
- मकर
राहुकाल और टालने योग्य समय
- राहु काल
- –
- यमगंड
- –
- गुलिक काल
- –
- गंड मूल
- –
- अशुभ योग
- –
शुभ समय
- अभिजीत मुहूर्त
- –
- आनंदादि योग
- –
- ब्रह्म मुहूर्त
- –
- गोधूलि मुहूर्त
- –
- निशीथ मुहूर्त
- –
- प्रातः संध्या
- –
- सायं संध्या
- –
- विजय मुहूर्त
- –
चौघड़िया
दिन
| नाम | से | तक |
|---|---|---|
| रोग | ||
| उद्वेग | ||
| चर | ||
| लाभ | ||
| अमृत | ||
| काल | ||
| शुभ | ||
| रोग |
रात्रि
| नाम | से | तक |
|---|---|---|
| काल | ||
| शुभ | ||
| रोग | ||
| उद्वेग | ||
| चर | ||
| लाभ | ||
| अमृत | ||
| काल |
होरा
| नाम | से | तक |
|---|---|---|
| मंगल | ||
| सूर्य | ||
| शुक्र | ||
| बुध | ||
| चंद्र | ||
| शनि | ||
| गुरु | ||
| मंगल | ||
| सूर्य | ||
| शुक्र | ||
| बुध | ||
| चंद्र | ||
| शनि | ||
| गुरु | ||
| मंगल | ||
| सूर्य | ||
| शुक्र | ||
| बुध | ||
| चंद्र | ||
| शनि | ||
| गुरु | ||
| मंगल | ||
| सूर्य | ||
| शुक्र |
लग्न
| नाम | से | तक |
|---|---|---|
| मकर | ||
| कुम्भ | ||
| मीन | ||
| मेष | ||
| वृषभ | ||
| मिथुन | ||
| कर्क | ||
| सिंह | ||
| कन्या | ||
| तुला | ||
| वृश्चिक | ||
| धनु | ||
| मकर |
त्योहार और व्रत
षट्तिला एकादशीमुहूर्त: – अमान्त पौष (पूर्णिमान्त माघ) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और तिल के छः प्रकार से उपयोग का विधान है।
आज ध्यान देने योग्य
- व्याघात योग
- गंड मूल