ताबीज क्या है?
ताबीज एक छोटी-सी चीज़ है, अक्सर कोई पत्थर, धातु का कोई गोल टुकड़ा, लिखा हुआ कोई पवित्र वचन या कोई जड़ी-बूटी, जिसे उसके अर्थ के कारण पहना या पास रखा जाता है। लगभग हर संस्कृति में ऐसी चीज़ें मिलती हैं: पश्चिम एशिया का नज़र का मनका, पूर्वी भूमध्य सागर के देशों (लेवांट) का हम्सा (खुली हथेली का चिह्न), भारतीय उपमहाद्वीप में गले या बाँह पर बाँधा जाने वाला ताबीज, और यूरोप में संत क्रिस्टोफ़र का पदक। ज़्यादातर ताबीजों का अर्थ उनके प्रतीक में है। आँख, हथेली या वह वचन उस देखभाल का प्रतीक है, जिसकी पहनने वाला कामना करता है; और उसे पास इसलिए रखा जाता है, क्योंकि उसके लिए उसका अर्थ गहरा है।
यंत्र क्या है?
यंत्र एक बिंदु के चारों ओर त्रिकोणों, वृत्तों और कमल-दलों से बना एक सटीक चित्र है। परंपरा में यह रेखाओं में देवता का रूप है: ऐसा मंत्र जिसे देखा जा सके, और मन के ठहरने की जगह। यह सिर्फ़ अपने अर्थ के लिए नहीं, एक साधना के लिए रखा जाता है। पहले इसे पूजा से अभिमंत्रित किया जाता है, फिर एक संकल्प के साथ इसकी स्थापना होती है (संकल्प: मन का एक निश्चय, एक वाक्य में), और उसके बाद हर दिन, इसके मंत्र के साथ, मन इसी के पास लौटता है। श्री यंत्र, महालक्ष्मी यंत्र और गायत्री यंत्र, तीनों अलग-अलग देवताओं के हैं, और हर एक के साथ उसी देवता का मंत्र जुड़ा है।
यंत्र आपका काम आपके बदले नहीं करता। काम आप करते हैं; यंत्र आपके संकल्प को आपकी आँखों के सामने रखता है। हर भक्ति-वस्तु की तरह, यह किसी निश्चित फल के वादे के साथ नहीं, बल्कि प्रेम से अर्पित है।
यंत्र और ताबीज की तुलना
| ताबीज | यंत्र | |
|---|---|---|
| अर्थ कहाँ से आता है | प्रतीक से: वस्तु उस रक्षा का प्रतीक है, जिसकी पहनने वाला कामना करता है। | देवता के रेखाओं में बने रूप से: हर यंत्र एक देवता और एक मंत्र से जुड़ा है। |
| अभिमंत्रण | अक्सर जैसा बना, वैसा ही बिकता है; कुछ परंपराओं में पहनने से पहले उसे अभिमंत्रित करते हैं। | परंपरा में, इस्तेमाल से पहले पूजा करके इसकी स्थापना होती है: प्राण-प्रतिष्ठा की विधि से। |
| किसलिए रखा जाता है | आम तौर पर कोई व्यापक भाव: रक्षा, सौभाग्य। | एक संकल्प के लिए। परंपरा में महालक्ष्मी यंत्र समृद्धि के लिए, गायत्री यंत्र पढ़ाई के लिए और हनुमान यंत्र साहस के लिए रखा जाता है। |
| साधना | पहना या पास रखा जाता है; आपसे रोज़ की कोई साधना नहीं माँगी जाती। | इसके मंत्र के जप और एक संकल्प के साथ रखा जाता है। यंत्र ध्यान का केंद्र है; साधना आपकी है। |
| किस परंपरा से | लोक परंपराओं से, जो हर इलाके में अलग हैं। | एक शास्त्रीय परंपरा से, जिसका वर्णन तंत्र ग्रंथों और श्रीविद्या के साहित्य में मिलता है। |
परंपरा के बारे में एक ईमानदार बात। भक्त अक्सर यंत्रों का मूल वेदों में मानते हैं, पर ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि “ज्यामितीय आकृतियों वाला चित्र”, यह अर्थ धीरे-धीरे आरंभिक शैव तंत्रों में बना, जहाँ यह शब्द पहले कई तरह की अनुष्ठान-विधियों के लिए आता था (Csaba Kiss, “On yantras in Early Śaiva Tantras”, Cracow Indological Studies 16, 2014)।
क्या दोनों साथ रख सकते हैं?
हाँ। बहुत से परिवार अपनी परंपरा का ताबीज पहनते हैं, और एक संकल्प के लिए पूजा घर या पर्स में यंत्र रखते हैं। दोनों में कोई होड़ नहीं: ताबीज शरीर पर रहता है, यंत्र आपकी रोज़ की साधना में।
कौन सा चुनें?
- ताबीज चुनें, अगर आपको शरीर पर पहनने की कोई चीज़ चाहिए; किसी एक संकल्प के बजाय रक्षा का एक व्यापक चिह्न चाहिए; रोज़ की कोई साधना नहीं करना चाहते; या अपने परिवार की परंपरा से आई कोई चीज़ चाहिए।
- यंत्र चुनें, अगर आपके मन में एक संकल्प है, जैसे समृद्धि, पढ़ाई, साहस या भक्ति; रोज़ कुछ मिनट मंत्र के साथ बैठने के लिए एक केंद्र चाहिए; या उसे पूजा घर में, मेज़ पर या पर्स में रखना है।
दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं: जिस परंपरा पर आपको भरोसा है, उसका ताबीज अच्छा चुनाव है। यंत्र के लिए यंत्र चुनने की गाइड हर संकल्प के लिए उसका कार्ड बताती है, और यंत्र की शुरुआत कैसे करें में सात चरण दिए गए हैं। हर भाग्य कार्ड भेजे जाने से पहले पुणे में वैदिक पूजा से अभिमंत्रित होता है।
लोग अक्सर पूछते हैं
क्या यंत्र भी एक तरह का ताबीज है?
विद्वान कभी-कभी दोनों को एक साथ गिनते हैं, क्योंकि दोनों आस्था से रखी जाने वाली पवित्र वस्तुएँ हैं। व्यवहार में दोनों अलग हैं: यंत्र पूजा से अभिमंत्रित होता है, एक संकल्प के लिए रखा जाता है, और हर दिन उसके मंत्र के साथ मन उसके पास लौटता है। यही उसे अलग करता है। भाग्य कार्ड एक यंत्र कार्ड है, ताबीज नहीं।
क्या यंत्र पहना जा सकता है?
हाँ। कुछ यंत्र रोज़ पहनने के लिए लॉकेट के रूप में बनते हैं। भाग्य कार्ड वॉलेट के आकार का है, इसलिए यह पूजा घर में भी ठीक रहता है और पर्स में भी, गल्ले में भी और मेज़ पर भी।
क्या यंत्र किसी फल का वादा करता है?
नहीं। यंत्र आपकी भक्ति और आपकी मेहनत का साथी है, उनकी जगह कभी नहीं लेता। इसका महत्व पुरानी परंपरा और आस्था से आता है, और यह किसी निश्चित फल के वादे के साथ नहीं, बल्कि प्रेम से अर्पित है।
और पढ़ें: यंत्र और रुद्राक्ष की तुलना · ज्ञान केंद्र · पूरा संग्रह