- भाषा
- हिंदी
- रचयिता या स्रोत
- अंतिम पंक्ति में देवीदास का नाम
- लंबाई
- चालीस चौपाइयाँ और समापन
इस पाठ के बारे में
उत्तर भारत के घरों में नवरात्रि की नौ रातों में, शुक्रवार को और देवी जागरण में इसका पाठ होता है। इसमें देवी के अनेक रूपों के नाम हैं: अन्नपूर्णा, सरस्वती, लक्ष्मी और कालिका, और दस महाविद्याओं में से मातंगी, धूमावती और बगला।
इसमें हिंगलाज और नगरकोट जैसे देवी स्थानों और असुरों की हार की कथा का स्मरण है। अंतिम भाग निजी प्रार्थना बन जाता है, और आखिरी पंक्ति में देवीदास का नाम आता है।
पाठ
चौपाई 1
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥१॥
नमन, नमन दुर्गा को, जो सुख देती हैं; नमन, नमन दुर्गा को, जो दुख हरती हैं।
चौपाई 2
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥२॥
आपकी ज्योति निराकार है और उसका उजाला तीनों लोकों में फैला है।
चौपाई 3
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥३॥
ललाट पर चंद्रमा, मुख बहुत विशाल, नेत्र लाल और भृकुटि विकराल।
चौपाई 4
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥४॥
माता का रूप बहुत सुहावना है; उसके दर्शन से जन को बड़ा सुख मिलता है।
चौपाई 5
तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥५॥
आपने संसार की शक्ति को अपने में लेकर रचना की, और पालन के लिए अन्न और धन दिया।
चौपाई 6
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥६॥
आप अन्नपूर्णा बनकर जग का पालन करती हैं; आप ही आदि सुंदरी बाला हैं।
चौपाई 7
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥७॥
प्रलय के समय आप सबका नाश करती हैं; आप गौरी हैं, शिव-शंकर की प्रिया।
चौपाई 8
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥८॥
शिव और योगी आपके गुण गाते हैं; ब्रह्मा और विष्णु नित्य आपका ध्यान करते हैं।
चौपाई 9
रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥९॥
आपने सरस्वती का रूप धरा, सुबुद्धि देकर ऋषियों और मुनियों का उद्धार किया।
चौपाई 10
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥१०॥
हे अंबा, आपने नरसिंह का रूप धरा और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं।
चौपाई 11
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥११॥
आपने रक्षा करके प्रह्लाद को बचाया और हिरण्याक्ष को स्वर्ग भेजा।
चौपाई 12
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥१२॥
आपने जग में लक्ष्मी का रूप धरा और श्री नारायण के अंग में समाईं।
चौपाई 13
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥१३॥
आप क्षीरसागर में विलास करती हैं। हे दया की सागर, मन की आशा पूरी कीजिए।
चौपाई 14
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥१४॥
हिंगलाज में आप ही भवानी हैं; आपकी अमित महिमा का बखान नहीं हो सकता।
चौपाई 15
मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥१५॥
आप माता मातंगी और धूमावती हैं, भुवनेश्वरी और बगला, जो सुख देती हैं।
चौपाई 16
श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥१६॥
आप श्री भैरवी और तारा हैं, जो जग को तारती हैं, और छिन्नमस्ता, जो संसार के दुख मिटाती हैं।
चौपाई 17
केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥१७॥
भवानी सिंह की सवारी पर शोभती हैं, और वीर लांगुर आगे-आगे चलते हैं।
चौपाई 18
कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥१८॥
हाथ में खप्पर और खड्ग शोभते हैं, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भागता है।
चौपाई 19
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥१९॥
अस्त्र और त्रिशूल शोभते हैं, जिनसे शत्रु के हृदय में शूल उठता है।
चौपाई 20
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत॥२०॥
नगरकोट में आप ही विराजती हैं, और तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।
चौपाई 21
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥२१॥
आपने दानव शुंभ और निशुंभ को मारा, और रक्तबीज और शंख का संहार किया।
चौपाई 22
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥२२॥
राजा महिषासुर बहुत अभिमानी था, जिसके पाप के भार से धरती व्याकुल थी।
चौपाई 23
रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥२३॥
आपने कालिका का विकराल रूप धरा और सेना सहित उसका संहार किया।
चौपाई 24
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥२४॥
जब-जब संतों पर कठिन समय आया, तब-तब हे माता, आप उनकी सहायक बनीं।
चौपाई 25
अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥२५॥
अमरपुरी और इंद्रलोक में आपकी महिमा से सब शोकरहित रहते हैं।
चौपाई 26
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥२६॥
ज्वाला में आपकी ज्योति है, और नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।
चौपाई 27
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥२७॥
इस चौपाई के अनुसार जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाते हैं, उनके निकट दुख और दरिद्रता नहीं आते।
चौपाई 28
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥२८॥
इस चौपाई के अनुसार जो मन लगाकर आपका ध्यान करता है, वह जन्म-मरण से छूट जाता है।
चौपाई 29
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥२९॥
योगी, देव और मुनि पुकारकर कहते हैं: आपकी शक्ति के बिना योग नहीं होता।
चौपाई 30
शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥३०॥
शंकराचार्य ने तप किया और काम, क्रोध और बाकी सब को जीत लिया।
चौपाई 31
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥३१॥
वे दिन-रात शंकर का ध्यान करते रहे और कभी आपका स्मरण नहीं किया।
चौपाई 32
शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥३२॥
उन्होंने शक्ति के रूप का मर्म नहीं जाना; जब शक्ति चली गई, तब मन में पछताए।
चौपाई 33
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥३३॥
वे शरण में आए और आपकी कीर्ति गाई: जय जय जय जगदंबा भवानी।
चौपाई 34
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥३४॥
आदि जगदंबा प्रसन्न हुईं और बिना देर शक्ति दे दी।
चौपाई 35
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥३५॥
हे माता, मुझे बहुत कष्ट ने घेर लिया है। आपके बिना मेरा दुख कौन हरेगा?
चौपाई 36
आशा तृष्णा निपट सतावें।
मोह मदादिक सब बिनशावें॥३६॥
आशा और तृष्णा मुझे बहुत सताती हैं। मोह, मद और बाकी सबका नाश कीजिए।
चौपाई 37
शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥३७॥
हे महारानी, शत्रुओं का नाश कीजिए; हे भवानी, मैं एकचित्त होकर आपका स्मरण करता हूँ।
चौपाई 38
करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥३८॥
हे दयालु माता, कृपा कीजिए; ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल कीजिए।
चौपाई 39
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥३९॥
जब तक जिऊँ, आपकी दया का फल पाऊँ, और सदा आपका यश सुनाऊँ।
चौपाई 40
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥४०॥
इस चौपाई के अनुसार जो कोई श्री दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर परम पद पाता है।
समापन
देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
देवीदास को अपनी शरण में जानकर, हे जगदंबा भवानी, कृपा कीजिए।
जहाँ पाठ में अंतर मिलता है
चौपाई 11 में प्रायः हिरण्याक्ष का नाम है। कुछ प्रतियों में यहाँ हिरण्यकशिपु मिलता है, जिसका वध पुराणों में नरसिंह ने किया। यह पेज प्रचलित पाठ रखता है।
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