आरती

जय अम्बे गौरी: दुर्गा जी की आरती

जय अम्बे गौरी दुर्गा जी की हिंदी आरती है, जिसके अंतिम पद में शिवानंद स्वामी का नाम आता है। इस पेज पर पूरा पाठ है: टेक और बारह पद, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
हिंदी
रचयिता या स्रोत
अंतिम पद में शिवानंद स्वामी का नाम
लंबाई
टेक और बारह पद

इस पाठ के बारे में

यह वह आरती है जो उत्तर भारत के घरों और मंदिरों में देवी के लिए गाई जाती है: नवरात्रि की नौ रातों में, माता की चौकी या देवी जागरण में, और शुक्रवार को। इसमें देवी का वह रूप है जो सिंह पर सवार है: खड्ग और खप्पर, और फिर वे असुर जिन्हें उन्होंने हराया, शुंभ-निशुंभ, महिषासुर, चंड-मुंड, रक्तबीज, मधु-कैटभ।

फिर देवी को ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला और जगत की माता कहा गया है। हर पद के बाद टेक लौटती है। महाराष्ट्र में देवी की एक मराठी आरती, दुर्गे दुर्घट भारी, अधिक गाई जाती है।

पाठ

टेक, हर पद के बाद फिर गाई जाती है

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिवरी ॥

जय हो अम्बे गौरी, मैया जय हो श्यामा गौरी। हरि, ब्रह्मा और शिव दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

पद 1

मांग सिंदूर विराजत,
टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना,
चंद्रवदन नीको ॥

माँग में सिंदूर शोभता है और माथे पर कस्तूरी का टीका। दोनों नयन उज्ज्वल हैं और चंद्रमा जैसा मुख सुंदर है।

पद 2

कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला,
कंठन पर साजै ॥

आपकी देह सोने जैसी है, और उस पर लाल वस्त्र शोभते हैं। गले में लाल फूलों की माला सजी है।

पद 3

केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत,
तिनके दुखहारी ॥

सिंह आपका वाहन है, और आप खड्ग और खप्पर धारण करती हैं। देव, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं, और आप उनके दुख हरती हैं।

पद 4

कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर,
सम राजत ज्योती ॥

कानों में कुंडल शोभते हैं और नाक पर मोती। आपकी ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों के समान है।

पद 5

शुंभ-निशुंभ बिदारे,
महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना,
निशदिन मदमाती ॥

आपने शुंभ और निशुंभ को चीर डाला और महिषासुर का वध किया। धूम्रलोचन को भस्म करने वाले आपके नयन दिन-रात उन्मत्त रहते हैं।

पद 6

चण्ड-मुण्ड संहारे,
शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे,
सुर भयहीन करे ॥

आपने चंड और मुंड का संहार किया और रक्तबीज का रक्त हर लिया। मधु और कैटभ दोनों को मारा और देवों को भयहीन किया।

पद 7

ब्रह्माणी, रुद्राणी,
तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी ॥

आप ब्रह्माणी हैं, रुद्राणी हैं और कमला रानी हैं। आगम और निगम आपका बखान करते हैं; आप शिव की पटरानी हैं।

पद 8

चौंसठ योगिनी मंगल गावत,
नृत्य करत भैरों ।
बाजत ताल मृदंगा,
अरू बाजत डमरू ॥

चौंसठ योगिनियाँ मंगल गाती हैं और भैरव नृत्य करते हैं। ताल और मृदंग बजते हैं, और डमरू भी बजता है।

पद 9

तुम ही जग की माता,
तुम ही हो भरता,
भक्तन की दुख हरता ।
सुख संपति करता ॥

आप ही जगत की माता हैं, और आप ही पालन करने वाली। इस पद के अनुसार आप भक्तों का दुख हरती हैं और उन्हें सुख और संपत्ति देती हैं।

पद 10

भुजा चार अति शोभित,
वर मुद्रा धारी ।
मनवांछित फल पावत,
सेवत नर नारी ॥

आपकी चारों भुजाएँ शोभती हैं और एक वर मुद्रा में है। इस पद के अनुसार जो नर-नारी आपकी सेवा करते हैं, उन्हें मनचाहा फल मिलता है।

पद 11

कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत,
कोटि रतन ज्योती ॥

सोने की थाली में अगर और कपूर की बाती सजी है। श्रीमालकेतु में करोड़ों रत्नों जैसी ज्योति शोभती है।

पद 12

श्री अंबेजी की आरती,
जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी,
सुख-संपति पावे ॥

इस पद के अनुसार जो कोई श्री अंबे जी की यह आरती गाता है, उसे सुख और संपत्ति मिलती है: ऐसा शिवानंद स्वामी कहते हैं।

जहाँ पाठ में अंतर मिलता है

प्रतियों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं: एक पद में कहीं "वर मुद्रा धारी" है तो कहीं "खड्ग खप्पर धारी", और कुछ शब्द अन्य स्थानों पर भी भिन्न हैं। यह पेज वही शब्द रखता है जो सबसे अधिक गाए जाते हैं।

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