स्तोत्र

राम रक्षा स्तोत्र

राम रक्षा स्तोत्र राम जी का संस्कृत स्तोत्र है, जिसकी अंतिम पंक्ति में बुधकौशिक का नाम आता है। इस पेज पर पूरा पाठ है: विनियोग, ध्यान, अड़तीस श्लोक और अंतिम पंक्ति, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
संस्कृत
रचयिता या स्रोत
अंतिम पंक्ति में बुधकौशिक का नाम
लंबाई
विनियोग, ध्यान, 38 श्लोक और समापन

इस पाठ के बारे में

यह स्तोत्र अपने बारे में कहता है कि शिव ने इसे स्वप्न में ऋषि बुधकौशिक को दिखाया, और उन्होंने जागकर इसे लिखा। मराठी घरों में यह विशेष रूप से प्रचलित है, बहुत से बच्चे इसे कंठस्थ करते हैं और संध्या में दीप के सामने बोलते हैं। आनंद रामायण में भी इसका एक रूप मिलता है।

इसमें राम के अलग-अलग नामों से शरीर के हर अंग की रक्षा माँगी गई है, फिर दोनों भाइयों की स्तुति है, फिर राम के अनेक नाम हैं, और अंत में वह प्रसिद्ध पंक्ति कि राम का एक नाम हज़ार नामों के बराबर है। ये पाठ के अपने कथन हैं।

पाठ

विनियोग

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषिः ।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता । अनुष्टुप् छन्दः ।
सीता शक्तिः । श्रीमद् हनुमान् कीलकम् ।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥

इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, देवता श्री सीता-रामचंद्र, छंद अनुष्टुप, शक्ति सीता और कीलक श्री हनुमान। श्री रामचंद्र की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा के जप में इसका विनियोग है।

ध्यान 1

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम् ॥

ध्यान करें उनका जिनकी भुजाएँ घुटनों तक हैं, जो धनुष-बाण लिए पद्मासन में बैठे हैं, पीले वस्त्र वाले, नए कमल दल से होड़ लेते नयन, प्रसन्न, बाईं गोद में बैठी सीता के मुख कमल से जिनके नयन मिलते हैं, मेघ जैसे श्याम, अलंकारों से दीप्त, विशाल जटा से शोभित: रामचंद्र।

श्लोक 1

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ १॥

रघुनाथ का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला है, और इस श्लोक के अनुसार उसका एक-एक अक्षर मनुष्य के महापाप का नाश करता है।

श्लोक 2

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २॥

नीले कमल जैसे श्याम, कमल नयन, जानकी और लक्ष्मण सहित, जटा के मुकुट से शोभित राम का ध्यान करके,

श्लोक 3

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३॥

तलवार, तरकश, धनुष और बाण लिए, निशाचरों के अंत करने वाले, अपनी लीला से जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुए अजन्मा प्रभु का,

श्लोक 4

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ ४॥

इस श्लोक के अनुसार बुद्धिमान राम रक्षा पढ़े, जो पाप नाश करने वाली और सब कामनाएँ देने वाली है। राघव मेरे सिर की रक्षा करें, दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की।

श्लोक 5

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ५॥

कौशल्या के पुत्र मेरी आँखों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञ के रक्षक मेरी नाक की और सौमित्रि के स्नेही मेरे मुख की रक्षा करें।

श्लोक 6

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥ ६॥

विद्या के निधि मेरी जीभ की, भरत से वंदित मेरे कंठ की, दिव्य अस्त्रों वाले मेरे कंधों की और शिव का धनुष तोड़ने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

श्लोक 7

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ ७॥

सीता के पति मेरे हाथों की, परशुराम को जीतने वाले मेरे हृदय की, खर के नाशक मेरे मध्य की और जाम्बवान के आश्रय मेरी नाभि की रक्षा करें।

श्लोक 8

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥ ८॥

सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की, हनुमान के प्रभु मेरे कूल्हों की, राक्षस कुल के नाशक रघुश्रेष्ठ मेरी जाँघों की रक्षा करें।

श्लोक 9

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ९॥

सेतु बनाने वाले मेरे घुटनों की, दशमुख के अंत करने वाले मेरी पिंडलियों की, विभीषण को श्री देने वाले मेरे पैरों की और राम मेरे पूरे शरीर की रक्षा करें।

श्लोक 10

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ १०॥

इस श्लोक के अनुसार जो पुण्यवान राम के बल से भरी यह रक्षा पढ़ता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयी होता है।

श्लोक 11

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ ११॥

इस श्लोक के अनुसार पाताल, पृथ्वी, आकाश और छल में चलने वाले भी राम नामों से रक्षित को देख तक नहीं सकते।

श्लोक 12

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२॥

इस श्लोक के अनुसार जो राम, रामभद्र या रामचंद्र कहकर स्मरण करता है, वह पापों में लिप्त नहीं होता, और भोग तथा मोक्ष पाता है।

श्लोक 13

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥ १३॥

इस श्लोक के अनुसार जो जग को जीतने वाले इस एक मंत्र को, राम नाम से रक्षित, कंठ में धारण करता है, सब सिद्धियाँ उसके हाथ में होती हैं।

श्लोक 14

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥ १४॥

इस श्लोक के अनुसार जो वज्रपंजर नाम के इस राम कवच का स्मरण करता है, उसकी आज्ञा हर जगह अटूट रहती है और उसे जय और मंगल मिलते हैं।

श्लोक 15

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ १५॥

जैसे हर ने स्वप्न में यह राम रक्षा बताई, वैसे ही प्रातः जागकर बुधकौशिक ने इसे लिखा।

श्लोक 16

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥ १६॥

कल्पवृक्षों का बाग, सब विपत्तियों का विराम, तीनों लोकों के प्रिय: वे श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं।

श्लोक 17

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १७॥

तरुण और रूपवान, सुकुमार और महाबली, कमल जैसे विशाल नयन वाले, छाल और कृष्ण मृग चर्म धारण किए,

श्लोक 18

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १८॥

फल और मूल खाने वाले, संयमी, तपस्वी और ब्रह्मचारी, दशरथ के ये दोनों पुत्र, भाई राम और लक्ष्मण,

श्लोक 19

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ १९॥

सब प्राणियों के शरण, सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ, राक्षस कुल के नाशक: वे दोनों रघुश्रेष्ठ हमारी रक्षा करें।

श्लोक 20

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥ २०॥

धनुष चढ़ाए, बाण छूते, अक्षय बाणों के तरकश लिए: मेरी रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण सदा मार्ग में मेरे आगे चलें।

श्लोक 21

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ २१॥

सन्नद्ध, कवचधारी, खड्ग, धनुष और बाण लिए, युवा: हमारे मनोरथ के साथ चलते राम लक्ष्मण सहित हमारी रक्षा करें।

श्लोक 22

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥ २२॥

राम, दशरथ के पुत्र, शूर, लक्ष्मण जिनके अनुचर हैं, बली; काकुत्स्थ, पूर्ण पुरुष, कौशल्या के पुत्र, रघुश्रेष्ठ;

श्लोक 23

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमान् अप्रमेय पराक्रमः ॥ २३॥

वेदांत से जानने योग्य, यज्ञ के ईश, पुराण पुरुषोत्तम, जानकी के प्रिय, श्रीमान, अप्रमेय पराक्रम वाले:

श्लोक 24

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥ २४॥

इस श्लोक के अनुसार जो मेरा भक्त श्रद्धा से इनका रोज़ जप करता है, वह अश्वमेध से अधिक पुण्य पाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 25

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैः न ते संसारिणो नराः ॥ २५॥

इस श्लोक के अनुसार जो दूर्वा दल जैसे श्याम, कमल नयन, पीले वस्त्र वाले राम की दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे संसारी नहीं रहते।

श्लोक 26

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥ २६॥

मैं राम को वंदन करता हूँ: लक्ष्मण के बड़े भाई, रघुश्रेष्ठ, सीता के पति, सुंदर, काकुत्स्थ, करुणा के सागर, गुणों के निधि, विप्रों के प्रिय, धार्मिक, राजेंद्र, सत्य प्रतिज्ञ, दशरथ के पुत्र, श्याम, शांत मूर्ति, लोक के प्रिय, रघुकुल के तिलक, राघव, रावण के शत्रु।

श्लोक 27

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ २७॥

राम को, रामभद्र को, रामचंद्र को, वेधा को, रघुनाथ को, नाथ को, सीता के पति को नमन।

श्लोक 28

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ २८॥

श्री राम, राम, रघुनंदन, राम, राम; श्री राम, राम, भरत के बड़े भाई, राम, राम; श्री राम, राम, रण में कठोर, राम, राम; श्री राम, राम, मेरी शरण बनिए, राम, राम।

श्लोक 29

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ २९॥

मैं श्री रामचंद्र के चरणों का मन से स्मरण करता हूँ, वचन से गान करता हूँ, सिर से नमन करता हूँ, उनकी शरण लेता हूँ।

श्लोक 30

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥ ३०॥

राम मेरी माता हैं, रामचंद्र मेरे पिता; राम मेरे स्वामी, रामचंद्र मेरे सखा। दयालु रामचंद्र मेरे सर्वस्व हैं; मैं किसी और को नहीं जानता, नहीं जानता।

श्लोक 31

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥ ३१॥

मैं उन रघुनंदन को वंदन करता हूँ, जिनके दाएँ लक्ष्मण, बाएँ जनक की पुत्री और सामने मारुति हैं।

श्लोक 32

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रम् शरणं प्रपद्ये ॥ ३२॥

लोक के प्रिय, रण में धीर, कमल नयन, रघुवंश के नाथ, करुणा के रूप, दया के आकर: मैं श्री रामचंद्र की शरण लेता हूँ।

श्लोक 33

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥ ३३॥

मन जैसे तेज़, वायु जैसे वेग वाले, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवन के पुत्र, वानर सेना के प्रमुख: मैं श्री राम के दूत की शरण लेता हूँ।

श्लोक 34

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥ ३४॥

मैं वाल्मीकि कोयल को वंदन करता हूँ, जो कविता की डाल पर चढ़कर मधुर अक्षरों में राम राम कूकते हैं।

श्लोक 35

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ३५॥

मैं लोक के प्रिय श्री राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो विपत्तियाँ हरते हैं और सब संपदाएँ देते हैं।

श्लोक 36

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥ ३६॥

इस श्लोक के अनुसार "राम राम" की गर्जना भव के बीज भूनती है, सुख-संपदा अर्जित कराती है और यमदूतों को डराती है।

श्लोक 37

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ ३७॥

राम, राजाओं के मणि, सदा विजयी हैं; मैं रमा के स्वामी राम को भजता हूँ। राम से निशाचरों की सेना नष्ट हुई; उन राम को नमन। राम से बड़ा कोई आश्रय नहीं; मैं राम का दास हूँ। मेरा चित्त सदा राम में लीन रहे; हे राम, मेरा उद्धार कीजिए।

श्लोक 38

रामरामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ३८॥

"राम, राम, राम": हे मनोरमा, मैं राम में रमता हूँ। इस श्लोक के अनुसार, हे सुमुखी, राम का नाम हज़ार नामों के बराबर है।

समापन

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री बुधकौशिक का रचा राम रक्षा स्तोत्र यहाँ पूरा होता है।

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