आरती

आरती कीजै श्री रघुवर जी की: राम जी की आरती

आरती कीजै श्री रघुवर जी की राम जी की पारंपरिक हिंदी आरती है, और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं। इस पेज पर पूरा पाठ है: टेक और चार पद, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
हिंदी
रचयिता या स्रोत
पारंपरिक; रचयिता ज्ञात नहीं
लंबाई
टेक और चार पद

इस पाठ के बारे में

उत्तर भारत में रामायण या सुंदरकांड के पाठ के बाद, संध्या पूजा में और रामनवमी की दोपहर राम जन्म के समय यह आरती गाई जाती है। इसमें राम की दो रूपों में स्तुति है: दशरथ और कौशल्या के पुत्र के रूप में, और सब रूपों से परे उस सहारे के रूप में जिस पर चर-अचर जगत टिका है।

रघुवर का अर्थ है रघु के वंश में श्रेष्ठ। हर पद के बाद टेक लौटती है। उत्तर भारत में राम की और भी आरतियाँ और स्तुतियाँ हैं, जिनमें तुलसीदास की श्री रामचंद्र कृपालु भी है।

पाठ

टेक, हर पद के बाद फिर गाई जाती है

आरती कीजै श्री रघुवर जी की,
सत् चित् आनंद शिव सुंदर की॥

श्री रघुवर जी की आरती कीजिए, जो सत्, चित् और आनंद हैं, शिव और सुंदर हैं।

पद 1

दशरथ तनय कौशल्या नन्दन,
सुर मुनि रक्षक दैत्य निकन्दन।
अनुगत भक्त, भक्त उर चन्दन,
मर्यादा पुरुषोत्तम वर की॥

दशरथ के पुत्र, कौशल्या के नंदन, देवों और मुनियों के रक्षक, दैत्यों के संहारक, अनुगामी भक्तों के हृदय के चंदन: उन मर्यादा पुरुषोत्तम की आरती।

पद 2

निर्गुण सगुण अनूप रूप निधि,
सकल लोक वंदित विभिन्न विधि।
हरण शोक-भय दायक नव निधि,
माया रहित दिव्य नर वर की॥

निर्गुण और सगुण, अनुपम रूप के निधि, सब लोकों में अनेक विधियों से वंदित, शोक और भय हरने वाले, नौ निधियों के दाता: माया से रहित उन दिव्य नर की आरती।

पद 3

जानकी पति सुर अधिपति जगपति,
अखिल लोक पालक त्रिलोक गति।
विश्व वंद्य अवन्ह अमित गति,
एक मात्र गति सचराचर की॥

जानकी के पति, देवों के अधिपति, जगत के स्वामी, सब लोकों के पालक, तीनों लोकों की गति, विश्व से वंदित, रक्षा करने वाले, अपार गति वाले: चर-अचर के एकमात्र सहारे की आरती।

पद 4

शरणागत वत्सल व्रतधारी,
भक्त कल्प तरुवर असुरारी।
नाम लेत जग पावनकारी,
वानर सखा दीन दुख हर की॥

शरण में आए लोगों पर स्नेह रखने वाले, व्रत के धनी, भक्तों के कल्पतरु, असुरों के शत्रु। जिनका नाम लेने से जग पावन होता है: वानरों के सखा, दीनों के दुख हरने वाले की आरती।

जहाँ पाठ में अंतर मिलता है

पद 3 का एक शब्द निश्चित नहीं है: "अमित गति" से पहले प्रतियों में "अवन्ह" या "अवन" मिलता है, और यह शब्द अस्पष्ट है। यहाँ अर्थ प्रसंग के अनुसार है, और सुधार का स्वागत है।

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