स्तोत्र

कनकधारा स्तोत्र

कनकधारा स्तोत्र लक्ष्मी जी का संस्कृत स्तोत्र है, जो परंपरा से आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। इस पेज पर पूरा पाठ है: आह्वान, इक्कीस श्लोक और समापन श्लोक, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
संस्कृत
रचयिता या स्रोत
परंपरा से आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है
लंबाई
आह्वान, 21 श्लोक और समापन

इस पाठ के बारे में

परंपरा कहती है कि बालक शंकर भिक्षा माँगते हुए एक निर्धन स्त्री के घर पहुँचे, जिसके पास देने के लिए केवल एक सूखा आँवला था। उसके दान से द्रवित होकर उन्होंने लक्ष्मी की यह स्तुति गाई, और सोने के आँवलों की वर्षा हुई। कनकधारा का अर्थ है सोने की धारा।

दक्षिण और पश्चिम भारत में शुक्रवार को और लक्ष्मी उपासना में इसका पाठ प्रायः होता है। ये परंपरा की कथा और कथन हैं। इसके अधिकतर श्लोक विष्णु पर ठहरी लक्ष्मी की दृष्टि के चित्र पर टिके हैं।

पाठ

ध्यान 1

वंदे वंदारु मंदारमिंदिरानंदकंदलम् ।
अमंदानंदसंदोह बंधुरं सिंधुराननम् ॥

मैं उन गजमुख को वंदन करता हूँ, जो वंदन करने वालों के मंदार हैं, इंदिरा के आनंद के अंकुर हैं, और महा आनंद के समूह के बंधु हैं।

श्लोक 1

अंगं हरेः पुलकभूषणमाश्रयंती
भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अंगीकृताखिलविभूतिरपांगलीला
मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवतायाः ॥ १ ॥

जैसे भौंरा कलियों वाले तमाल पर बैठता है, वैसे मंगल देवी की दृष्टि हरि के रोमांचित अंग पर ठहरती है। सारी विभूति वाली वह कटाक्ष लीला मेरा मंगल करे।

श्लोक 2

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः ॥ २ ॥

जैसे भौंरी बड़े कमल पर, वैसे प्रेम और लज्जा से भरी दृष्टि मुरारि के मुख पर बार-बार जाती और लौटती है। सागर से जन्मी देवी की वह दृष्टि माला मुझे श्री दे।

श्लोक 3

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुंदम्-
आनंदकंदमनिमेषमनंगतंत्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनायाः ॥ ३ ॥

वे आनंद से अधमुँदी आँखों से मुकुंद को एकटक देखती हैं, जो आनंद के मूल और प्रेम का तंत्र हैं। शेषशायी की प्रिया की वह तिरछी दृष्टि मेरे कल्याण के लिए हो।

श्लोक 4

बाह्वंतरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ४ ॥

मधु के शत्रु के वक्ष पर, जहाँ कौस्तुभ है, उनकी दृष्टि नीलम के हार जैसी चमकती है। यह भगवान की भी कामना पूरी करती है: कमल में बसने वाली की वह दृष्टि माला मेरा कल्याण करे।

श्लोक 5

कालांबुदालिललितोरसि कैटभारेः
धाराधरे स्फुरति या तटिदंगनेव ।
मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनंदनायाः ॥ ५ ॥

जैसे बादल पर बिजली, वैसे वे कैटभ के शत्रु के मेघ जैसे वक्ष पर चमकती हैं: सब लोकों की माता, पूज्य रूप। भृगु की पुत्री मुझे कल्याण दें।

श्लोक 6

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्
मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मंथरमीक्षणार्धं
मंदालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ६ ॥

जिस दृष्टि के प्रभाव से मन्मथ ने पहले मंगल से भरे मधु के शत्रु में स्थान पाया, सागर की पुत्री की वह मंद और अलसाई अर्ध दृष्टि यहाँ मुझ पर पड़े।

श्लोक 7

विश्वामरेंद्रपदविभ्रमदानदक्षं
आनंदहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धं
इंदीवरोदरसहोदरमिंदिरायाः ॥ ७ ॥

जो सब देवराजों का पद देने में समर्थ है, और मुर के शत्रु को भी अधिक आनंद देती है, इंदिरा की वह नीलकमल जैसी अर्ध दृष्टि क्षण भर मुझ पर ठहरे।

श्लोक 8

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ८ ॥

जिनकी दया भरी दृष्टि से विशिष्ट बुद्धि वाले भी स्वर्ग सरलता से पाते हैं। कमल पर विराजी उन देवी की खिले कमल जैसी उज्ज्वल दृष्टि मेरी इच्छित समृद्धि करे।

श्लोक 9

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणांबुधारा-
मस्मिन्नकिंचन विहंगशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनांबुवाहः ॥ ९ ॥

दया की पवन से चलता नारायण की प्रिया का नयन रूपी मेघ, दुष्कर्म की गरमी को दूर करके, मुझ निर्धन और दुखी पक्षी के बच्चे पर धन की धारा बरसाए।

श्लोक 10

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुंदरीति
शाकंभरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १० ॥

वाणी की देवी, गरुड़ध्वज की सुंदरी, शाकंभरी, चंद्रशेखर की प्रिया के रूप में: सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित, तीनों लोकों के एक गुरु की युवा पत्नी को नमन।

श्लोक 11

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११ ॥

शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति को नमन; सुंदर गुणों की सागर रति को नमन; कमल में बसने वाली शक्ति को नमन; पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि को नमन।

श्लोक 12

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२ ॥

कमल जैसे मुख वाली को नमन; क्षीरसागर से जन्मी को नमन; सोम और अमृत की बहन को नमन; नारायण की प्रिया को नमन।

श्लोक 13

नमोऽस्तु हेमांबुजपीठिकायै
नमोऽस्तु भूमंडलनायिकायै ।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै
नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १३ ॥

सोने के कमल के आसन वाली को नमन; भूमंडल की स्वामिनी को नमन; देवों आदि पर दया करने वाली को नमन; शार्ङ्ग धनुष वाले की प्रिया को नमन।

श्लोक 14

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनंदनायै
नमोऽस्तु विष्णोरुरसिस्थितायै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ १४ ॥

भृगु की पुत्री देवी को नमन; विष्णु के वक्ष पर बसने वाली को नमन; कमल में बसने वाली लक्ष्मी को नमन; दामोदर की प्रिया को नमन।

श्लोक 15

नमोऽस्तु कांत्यै कमलेक्षणायै
नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै
नमोऽस्तु नंदात्मजवल्लभायै ॥ १५ ॥

कमल नयनों वाली कांति को नमन; लोकों की जननी भूति को नमन; देवों आदि से पूजित को नमन; नंद के पुत्र की प्रिया को नमन।

श्लोक 16

संपत्कराणि सकलेंद्रियनंदनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वंदनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयंतु मान्ये ॥ १६ ॥

हे कमल नयना माता, आपके वंदन समृद्धि देते हैं, सब इंद्रियों को आनंद देते हैं, साम्राज्य का वैभव देते हैं और पाप से उबारने को तत्पर हैं: हे मान्ये, वे सदा मेरे साथ रहें, यह श्लोक की प्रार्थना है।

श्लोक 17

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसंपदः ।
संतनोति वचनांगमानसैः
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७ ॥

इस श्लोक के अनुसार आपके कटाक्ष की उपासना सेवक को सब प्रयोजन और संपदा देती है। वाणी, शरीर और मन से मैं आपको भजता हूँ, हे मुरारि के हृदय की स्वामिनी।

श्लोक 18

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगंधमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १८ ॥

कमल में बसने वाली, हाथ में कमल लिए, अति श्वेत वस्त्र, चंदन और माला से शोभित: हे भगवती, हरि की प्रिया, मन को भाने वाली, तीनों लोकों को समृद्ध करने वाली, मुझ पर प्रसन्न होइए।

श्लोक 19

दिग्घस्तिभिः कनककुंभमुखावसृष्ट
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १९ ॥

प्रातः मैं जगत की माता को नमन करता हूँ, सब लोकों के स्वामी की पत्नी, अमृत के सागर की पुत्री, जिनके अंग दिग्गजों द्वारा सोने के कलशों से उड़ेले आकाश गंगा के निर्मल जल से भीगे हैं।

श्लोक 20

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरंगितैरपांगैः ।
अवलोकय मामकिंचनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ २० ॥

हे कमला, कमल नयन की प्रिया, करुणा की बाढ़ से उमड़ते कटाक्षों से मुझे देखिए: जिनके पास कुछ नहीं, उनमें मैं आपकी दया का पहला सच्चा पात्र हूँ।

श्लोक 21

स्तुवंति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवंति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ २१ ॥

इस श्लोक के अनुसार जो इन स्तुतियों से रोज़ रमा की, तीनों वेदों वाली, तीनों लोकों की माता की स्तुति करते हैं, वे गुणों में बड़े और बड़े भाग्य वाले होते हैं, और पृथ्वी पर ज्ञानी उनके मन को सराहते हैं।

समापन श्लोक 1

सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छंकराचार्य निर्मितम् ।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत् ॥

इस श्लोक के अनुसार जो शंकराचार्य की रची सुवर्णधारा की इस स्तुति को रोज़ तीनों संध्याओं में पढ़ता है, वह कुबेर के समान होता है।

जहाँ पाठ में अंतर मिलता है

प्रतियों में कुछ शब्द और लंबाई अलग है। कुछ में समापन से पहले एक-दो श्लोक और मिलते हैं; यह पेज प्रचलित इक्कीस रखता है।

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