आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता: लक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता लक्ष्मी जी की पारंपरिक हिंदी आरती है, और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं। इस पेज पर पूरा पाठ है: टेक और सात पद, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
हिंदी
रचयिता या स्रोत
पारंपरिक; रचयिता ज्ञात नहीं
लंबाई
टेक और सात पद

इस पाठ के बारे में

दिवाली की शाम के लक्ष्मी पूजन में, धनतेरस और शरद पूर्णिमा पर, और शुक्रवार को परिवार यह आरती गाते हैं। इसमें देवी का पुराणों वाला चित्र है: क्षीरसागर से चौदह रत्नों के साथ प्रकट हुई लक्ष्मी, जिन्हें उमा, रमा, ब्रह्माणी और दुर्गा के नामों से पुकारा गया है।

इसकी धुन ॐ जय जगदीश हरे से मिलती है, इसलिए इसे सीखना आसान है। हर पद के बाद टेक लौटती है।

पाठ

टेक, हर पद के बाद फिर गाई जाती है

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। हरि, विष्णु और विधाता दिन-रात आपकी सेवा करते हैं।

पद 1

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

आप उमा, रमा और ब्रह्माणी हैं; आप ही जगत की माता हैं। सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि आपका गान करते हैं।

पद 2

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

आप दुर्गा रूप में निरंजनी हैं और सुख-संपत्ति देने वाली। इस पद के अनुसार जो कोई आपका ध्यान करता है, उसे ऋद्धि, सिद्धि और धन मिलता है।

पद 3

तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥

आप पाताल में निवास करती हैं और आप ही शुभ देने वाली हैं। आप कर्म के प्रभाव को प्रकाशित करती हैं और भवसागर से रक्षा करती हैं।

पद 4

जिस घर तुम रहती तहाँ, सब सद्गुण आता।
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता॥

इस पद के अनुसार जिस घर में आप रहती हैं, वहाँ सब सद्गुण आते हैं। सब कुछ संभव हो जाता है और मन नहीं घबराता।

पद 5

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

आपके बिना कोई यज्ञ नहीं होता और किसी को वस्त्र नहीं मिलता। खान-पान का वैभव सब आपसे ही आता है।

पद 6

शुभगुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥

आप शुभ गुणों का सुंदर मंदिर हैं, क्षीरसागर की पुत्री। आपके बिना चौदह रत्न कोई नहीं पाता।

पद 7

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥

इस पद के अनुसार जो कोई महालक्ष्मी जी की आरती गाता है, उसके हृदय में आनंद समाता है और पाप उतर जाता है।

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