स्तुति

बजरंग बाण

बजरंग बाण हनुमान जी की स्तुति है, अवधी में, जो परंपरा से तुलसीदास की मानी जाती है। इस पेज पर इसका प्रचलित पूरा पाठ है: आरंभिक दोहा, तैंतीस चौपाइयाँ और अंतिम दोहा, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
अवधी
रचयिता या स्रोत
परंपरा से तुलसीदास रचित माना जाता है
लंबाई
दोहा, तैंतीस चौपाइयाँ और दोहा

इस पाठ के बारे में

बाण का अर्थ है तीर: इस प्रार्थना को ऐसा तीर माना गया है जो हनुमान जी को तुरंत बुलाता है। परंपरा इसे तुलसीदास की मानती है, यद्यपि यह उन रचनाओं में नहीं है जिन्हें विद्वान निश्चित रूप से उनकी मानते हैं।

उत्तर भारत के भक्त मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ करते हैं। इसका स्वर प्रखर है। इसमें हनुमान जी को शपथ और बीज अक्षरों से पुकारा गया है, और भूत, प्रेत और शत्रुओं पर प्रहार की प्रार्थना है। ये पाठ के अपने शब्द हैं, जैसे हैं वैसे ही रखे गए हैं। बहुत से परिवार इसे हनुमान चालीसा के बाद पढ़ते हैं।

पाठ

आरंभिक दोहा

दोहा 1

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥

इस दोहे के अनुसार जो निश्चय, प्रेम और विश्वास से सम्मानपूर्वक विनती करते हैं, उनके सब शुभ काम हनुमान सिद्ध करते हैं।

चौपाइयाँ

चौपाई 1

जय हनुमंत संत हितकारी ।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥

जय हो हनुमंत, संतों के हितकारी: हे प्रभु, हमारी अरज सुन लीजिए।

चौपाई 2

जन के काज बिलंब न कीजै ।
आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥

अपने जन के काम में देर न कीजिए: आतुर होकर दौड़िए और महा सुख दीजिए।

चौपाई 3

जैसे कूदि सिंधु महिपारा ।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥

जैसे आप समुद्र के पार कूद गए, और सुरसा के मुख में पैठकर बढ़े,

चौपाई 4

आगे जाय लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुरलोका ॥

और आगे जाने पर लंकिनी ने रोका, तो आपने लात मारी और वह सुरलोक चली गई;

चौपाई 5

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥

जाकर विभीषण को सुख दिया, और सीता को देखकर परमपद पाया;

चौपाई 6

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।
अति आतुर जमकातर तोरा ॥

बाग उजाड़कर समुद्र में डुबोया, और बड़ी शीघ्रता से यम की कटार तोड़ी;

चौपाई 7

अक्षय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेटि लंक को जारा ॥

अक्षयकुमार को मारकर संहार किया, और पूँछ लपेटकर लंका जलाई;

चौपाई 8

लाह समान लंक जरि गई ।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥

लाख की तरह लंका जल गई, और सुरपुर और आकाश में जय-जय की ध्वनि हुई।

चौपाई 9

अब बिलंब केहि कारन स्वामी ।
कृपा करहु उर अंतरयामी ॥

अब देर किसलिए, हे स्वामी? हे हृदय के अंतर्यामी, कृपा कीजिए।

चौपाई 10

जय जय लखन प्रान के दाता ।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥

जय जय, लक्ष्मण के प्राणदाता: आतुर होकर मेरा दुख मिटाइए।

चौपाई 11

जै हनुमान जयति बलसागर ।
सुर समूह समरथ भटनागर ॥

जय हो हनुमान, बल के सागर, सुरों के समूह में समर्थ वीर।

चौपाई 12

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले ।
बैरिहि मारू बज्र की कीले ॥

ॐ, मारिए, मारिए, मारिए, हठीले हनुमंत: शत्रु को वज्र की कीलों से मारिए।

चौपाई 13

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो ।
महाराज प्रभु दास उबारो ॥

गदा और वज्र लेकर शत्रु को मारिए। हे महाराज प्रभु, दास का उद्धार कीजिए।

चौपाई 14

ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो ।
बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ॥

ॐकार और हुंकार के साथ, हे महाप्रभु, दौड़िए; हे हनुमान, वज्र और गदा लाने में देर न कीजिए।

चौपाई 15

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा ।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरिउरसीशा ॥

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं, हनुमंत, वानरों के स्वामी; ॐ हुं हुं हुं, हनुमान, शत्रु की छाती और सिर पर।

चौपाई 16

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै ।
राम दूत धरू मारू धाइ कै ॥

हरि की शपथ पाकर सत्य कीजिए: हे राम के दूत, दौड़कर पकड़िए और मारिए।

चौपाई 17

जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
दुख पावत जन केहि अपराधा ॥

जय जय जय, अगाध हनुमंत: आपके जन किस अपराध से दुख पा रहे हैं?

चौपाई 18

पूजा जप तप नेम अचारा ।
नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ॥

मैं पूजा, जप, तप, नियम और आचार नहीं जानता; मैं आपका दास हूँ।

चौपाई 19

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ॥

वन, उपवन, मार्ग, पर्वत या घर में, आपके बल से मुझे डर नहीं लगता।

चौपाई 20

जय अंजनि कुमार बलवन्ता ।
शंकरसुवन बीर हनुमन्ता ॥

जय हो अंजनी के बलवान पुत्र, शंकर के सुवन, वीर हनुमान।

चौपाई 21

बदन कराल काल-कुल-घालक ।
राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥

विकराल मुख, काल के कुल का नाश करने वाले, राम के सहायक, सदा पालन करने वाले।

चौपाई 22

भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर ।
अगिन बेताल काल मारी मर ॥

भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि बेताल, काल और मारी:

चौपाई 23

इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की ।
राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥

इन्हें मारिए, आपको राम की शपथ है; हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखिए।

चौपाई 24

जनकसुता हरि दास कहावौ ।
ताकी सपथ बिलंब न लावौ ॥

आप जानकी और हरि के दास कहलाते हैं: उनकी शपथ है, देर न कीजिए।

चौपाई 25

जै जै जै धुनि होत अकासा ।
सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥

आकाश में जय जय जय की ध्वनि होती है। इस चौपाई के अनुसार आपका स्मरण करने से असह्य दुख भी नष्ट होता है।

चौपाई 26

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं ।
यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥

चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ। इस अवसर पर और किसे पुकारूँ?

चौपाई 27

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई ।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई ॥

उठिए, उठिए, चलिए, आपको राम की दुहाई है। पाँव पड़ता हूँ, हाथ जोड़कर मनाता हूँ।

चौपाई 28

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता ।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥

ॐ चं चं चं चं, चपल गति वाले; ॐ हनु हनु हनु हनु, हनुमंत।

चौपाई 29

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल ।
ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥

ॐ हं हं, चंचल कपि हाँक देते हैं; ॐ सं सं, दुष्टों का दल सहमकर भागता है।

चौपाई 30

यह बजरंग-बाण जेहि मारै ।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै ॥

इस चौपाई के अनुसार यह बजरंग बाण जिसे मारे, बताइए फिर उसे कौन बचाए?

चौपाई 31

पाठ करै बजरंग-बाण की ।
हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥

इस चौपाई के अनुसार जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।

चौपाई 32

यह बजरंग बाण जो जापैं ।
तासों भूत-प्रेत सब काँपैं ॥

इस चौपाई के अनुसार जो यह बजरंग बाण जपते हैं, उनसे भूत-प्रेत सब काँपते हैं।

चौपाई 33

धूप देय जो जपै हमेसा ।
ताके तन नहिं रहै कलेसा ॥

इस चौपाई के अनुसार जो धूप देकर सदा जप करता है, उसके तन में क्लेश नहीं रहता।

अंतिम दोहा

दोहा 2

उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान ।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान ॥

इस दोहे के अनुसार हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण में आकर, ध्यान से पाठ करने पर हनुमान सब बाधाएँ हरते हैं और सब काम सफल करते हैं।

जहाँ पाठ में अंतर मिलता है

छपी प्रतियों में लंबाई और पंक्तियों का क्रम अलग-अलग है। कुछ में चौपाई 29 और 30 के बीच चौपाई की लगभग अट्ठाईस पंक्तियाँ और मिलती हैं, जिनमें और स्तुति और फल के कथन हैं। यह पेज वही छोटा रूप रखता है जो सबसे अधिक पढ़ा जाता है।

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