उपनिषद

गणेश अथर्वशीर्ष

गणेश अथर्वशीर्ष गणेश जी का संस्कृत पाठ है, जिसे परंपरा अथर्ववेद के उपनिषदों में गिनती है। इस पेज पर पूरा पाठ है: आरंभिक शांति पाठ, चौदह खंड और अंतिम शांति पाठ, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
संस्कृत
रचयिता या स्रोत
परंपरा से अथर्ववेद के उपनिषदों में गिना जाता है
लंबाई
शांति पाठ, चौदह खंड और शांति पाठ

इस पाठ के बारे में

इस नाम का अर्थ है अथर्ववेद का शीर्ष। परंपरा इसे उपनिषदों में गिनती है, और इसके अंत में अथर्वण का नाम आता है; विद्वान इसे 16वीं या 17वीं सदी का मानते हैं। इसका कथन है कि गणेश ही ब्रह्म हैं, सारा जगत उन्हीं से होता है और उन्हीं में लौटता है, और इसमें ॐ गं गणपतये नमः मंत्र और गणेश गायत्री हैं।

पूरे महाराष्ट्र में, विशेषकर गणेशोत्सव के दस दिनों में, प्रायः समूह में इसका पाठ होता है, और रांजणगाँव के मंदिर की दीवार पर यह खुदा हुआ है।

पाठ

शांति पाठ 1

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ तन्मामवतु
तद् वक्तारमवतु
अवतु माम्
अवतु वक्तारम्
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः॥

ॐ। हे देवो, हम कानों से शुभ सुनें और आँखों से शुभ देखें। दृढ़ अंगों और शरीर से स्तुति करते हुए देवों की दी आयु जिएँ। महायशस्वी इंद्र, सर्वज्ञ पूषा, अखंड रथचक्र वाले तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। वह मेरी और वक्ता की रक्षा करे। ॐ शांति, शांति, शांति।

खंड 1

हरिः ॐ नमस्ते गणपतये ॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥ त्वमेव केवलं कर्ताऽसि ॥
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि ॥ त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ॥
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ॥
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ १॥

गणपति, आपको नमन। आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व हैं। केवल आप ही कर्ता, केवल आप ही धर्ता, केवल आप ही हर्ता हैं। आप ही यह सब, ब्रह्म हैं। आप ही साक्षात नित्य आत्मा हैं।

खंड 2

ऋतं वच्मि ॥ सत्यं वच्मि ॥ २॥

मैं ऋत बोलता हूँ। मैं सत्य बोलता हूँ।

खंड 3

अव त्वं माम् ॥ अव वक्तारम् ॥ अव श्रोतारम् ॥
अव दातारम् ॥ अव धातारम् ॥
अवानूचानमव शिष्यम् ॥
अव पश्चात्तात् ॥ अव पुरस्तात् ॥
अवोत्तरात्तात् ॥ अव दक्षिणात्तात् ॥
अव चोर्ध्वात्तात् ॥ अवाधरात्तात् ॥
सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥ ३॥

मेरी रक्षा कीजिए, वक्ता, श्रोता, दाता, धारण करने वाले, विद्वान आचार्य और शिष्य की रक्षा कीजिए। पीछे, आगे, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे से रक्षा कीजिए। सब ओर से मेरी रक्षा कीजिए।

खंड 4

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः ॥
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः ॥
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि ॥
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ॥
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ४॥

आप वाणी और चेतना हैं, आनंद और ब्रह्म हैं। आप सत्, चित् और आनंद हैं, अद्वितीय। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप ज्ञान और विज्ञान हैं।

खंड 5

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥
त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५॥

यह सारा जगत आपसे जन्मता है, आपसे टिकता है, आप में लय होगा और आप में ही लौटता है। आप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। आप वाणी के चार स्तर हैं।

खंड 6

त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः ॥
त्वं देहत्रयातीतः ॥ त्वं कालत्रयातीतः ॥
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः ॥
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम् ॥
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं
इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ॥ ६॥

आप तीन गुणों, तीन अवस्थाओं, तीन शरीरों और तीन कालों से परे हैं। आप नित्य मूलाधार में स्थित हैं। आप तीन शक्तियों वाले हैं। योगी नित्य आपका ध्यान करते हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चंद्रमा हैं, आप ब्रह्म, लोक और ॐ हैं।

खंड 7

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम् ॥
अनुस्वारः परतरः ॥ अर्धेन्दुलसितम् ॥ तारेण ऋद्धम् ॥
एतत्तव मनुस्वरूपम् ॥ गकारः पूर्वरूपम् ॥
अकारो मध्यमरूपम् ॥ अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् ॥
बिन्दुरुत्तररूपम् ॥ नादः संधानम् ॥
संहितासंधिः ॥ सैषा गणेशविद्या ॥
गणकऋषिः ॥ निचृद्गायत्रीच्छंदः ॥
गणपतिर्देवता ॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७॥

पहले गण का पहला अक्षर बोलकर, फिर पहला स्वर, फिर अर्धचंद्र से शोभित अनुस्वार, ॐ से दीप्त: यह आपके मंत्र का रूप है। ग पहला रूप है, अ मध्य, अनुस्वार अंतिम, बिंदु उसके आगे और नाद उन्हें जोड़ता है; संहिता उनकी संधि है। यह गणेश विद्या है। इसके ऋषि गणक, छंद निचृद् गायत्री, देवता गणपति हैं। ॐ गं गणपतये नमः।

खंड 8

एकदंताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि ॥
तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ॥ ८॥

हम एकदंत को जानते हैं, वक्रतुंड का ध्यान करते हैं। वे दंती हमें प्रेरित करें।

खंड 9

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् ॥
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ॥
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९॥

एक दाँत और चार हाथ वाले, पाश और अंकुश लिए, दाँत और वर मुद्रा धारण किए, ध्वज पर मूषक, लाल, लंबे पेट वाले, सूप जैसे कान, लाल वस्त्र, लाल चंदन से लिप्त, लाल फूलों से पूजित; भक्तों पर कृपालु, जगत के कारण, अच्युत, सृष्टि के आरंभ में प्रकट, प्रकृति और पुरुष से परे। इस खंड के अनुसार जो रोज़ इनका ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ है।

खंड 10

नमो व्रातपतये । नमो गणपतये । नमः प्रमथपतये ।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय ।
विघ्ननाशिने शिवसुताय । श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥ १०॥

व्रात के स्वामी को नमन, गणों के स्वामी को नमन, प्रमथों के स्वामी को नमन। लंबोदर, एकदंत, विघ्न के नाशक, शिव के पुत्र, वरदमूर्ति, आपको नमन।

खंड 11

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ॥ स ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
स सर्वतः सुखमेधते ॥ स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते ॥
स पंचमहापापात्प्रमुच्यते ॥
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ॥
सायंप्रातः प्रयुंजानो अपापो भवति ॥
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ॥
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ॥
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ॥
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते
तं तमनेन साधयेत् ॥ ११॥

इस खंड के अनुसार: जो इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है वह ब्रह्म होने योग्य होता है, सब ओर से सुखी होता है, विघ्नों से बाधित नहीं होता और पाँच महापापों से छूटता है। संध्या में पढ़ने से दिन का पाप, प्रातः में रात का पाप नष्ट होता है, दोनों समय से पापरहित होता है, और सब जगह विघ्नरहित होता है, और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पाता है। यह अशिष्य को नहीं देना चाहिए; जो मोहवश देता है वह अधिक पापी होता है। हज़ार आवृत्ति से जो चाहे वह इससे सिद्ध करे।

खंड 12

अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति ॥
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति ।
स यशोवान् भवति ॥
इत्यथर्वणवाक्यम् ॥ ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति ॥ १२॥

इस खंड के अनुसार: जो इससे गणपति का अभिषेक करता है वह वाग्मी होता है। जो चतुर्थी को उपवास कर जप करता है वह विद्वान और यशस्वी होता है। यह अथर्वण का वचन है। जो ब्रह्म आदि के आवरण को जानता है वह कभी नहीं डरता।

खंड 13

यो दूर्वांकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ॥
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति ॥
स मेधावान् भवति ॥
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छितफलमवाप्नोति ॥
यः साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥ १३॥

इस खंड के अनुसार: जो दूर्वा के अंकुरों से पूजता है वह कुबेर के समान होता है; लाजा से यशस्वी और मेधावी होता है; हज़ार मोदक से मनचाहा फल पाता है; घी सहित समिधा से सब कुछ पाता है, सब कुछ पाता है।

खंड 14

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति ॥
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति ॥
महाविघ्नात्प्रमुच्यते ॥ महादोषात्प्रमुच्यते ॥
महापापात् प्रमुच्यते ॥
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति ॥
य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ १४॥

इस खंड के अनुसार: जो आठ ब्राह्मणों को इसे विधि से ग्रहण कराता है वह सूर्य जैसा तेजस्वी होता है। जो सूर्य ग्रहण में, महानदी पर या मूर्ति के पास जप करता है उसे मंत्र सिद्धि मिलती है, और वह महाविघ्न, महादोष और महापाप से छूटता है। जो ऐसा जानता है वह सर्वज्ञ है, सर्वज्ञ है: ऐसा उपनिषद कहता है।

शांति पाठ 2

ॐ सहनाववतु ॥ सहनौभुनक्तु ॥
सह वीर्यं करवावहै ॥
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः ॥

ॐ। वह हम दोनों की रक्षा करे, हम दोनों का पोषण करे, हम साथ पराक्रम करें, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम द्वेष न करें। फिर वही आरंभिक प्रार्थना: हम शुभ सुनें, शुभ देखें, देवों की दी आयु जिएँ, और इंद्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। ॐ शांति, शांति, शांति।

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