- भाषा
- ब्रज प्रभाव वाली हिंदी
- रचयिता या स्रोत
- पारंपरिक; रचयिता ज्ञात नहीं
- लंबाई
- टेक और चार पद
इस पाठ के बारे में
इस नाम का अर्थ है वृंदावन के कुंजों में विहार करने वाले। यह जन्माष्टमी की रात कृष्ण जन्म के मुहूर्त के बाद, और बहुत से घरों में सुबह-शाम की पूजा में गाई जाती है। इसके चित्र ब्रज के हैं: वैजंती माला, मुरली, साथ में राधा, यमुना की चमकती रेत और गोधूलि की गायें।
तीसरा पद गंगा की ओर मुड़ता है, जो परंपरा में विष्णु के चरण से निकली मानी जाती हैं। हर पद के बाद टेक लौटती है।
पाठ
टेक, हर पद के बाद फिर गाई जाती है
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
कुंज में विहार करने वाले की आरती, श्री गिरिधर, कृष्ण, मुरारी की आरती।
पद 1
गले में बैजंती माला, बजावे मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
गले में वैजंती माला है और बालक कृष्ण मधुर मुरली बजाते हैं। कानों में कुंडल झलकते हैं; वे नंद के आनंद, नंद के लाल हैं। आकाश जैसी साँवली देह है, और सखी, साथ में राधिका चमक रही हैं। लताओं में वनमाली खड़े हैं, भौंरों जैसी अलकें, कस्तूरी का तिलक, चंद्रमा जैसी झलक: प्यारी श्यामा की छवि मनोहर है।
पद 2
कनकमय मोर मुकुट बिलसे, देवता दरसन को तरसे।
गगन सों सुमन रासि बरसे,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की॥
सोने जैसा मोर मुकुट शोभता है और देवता दर्शन को तरसते हैं। आकाश से फूलों की वर्षा होती है। मुरचंग और मधुर मृदंग बजते हैं, ग्वालिनें साथ हैं, और गोप कुमारियों का प्रेम अतुल है।
पद 3
जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरे अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की॥
जहाँ से गंगा प्रकट हुईं, मन हरने वाली श्री गंगा। इस पद के अनुसार उनके स्मरण से मोह मिटता है, और वे शिव के सिर पर, जटाओं के बीच बसकर पाप का कीचड़ हरती हैं। यह छवि श्री बनवारी के चरणों की है।
पद 4
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की॥
तट की उजली रेत चमकती है और वृंदावन में बाँसुरी बज रही है। चारों ओर गोपियाँ, ग्वाले और गायें हैं। वे धीरे से हँसते हैं और चाँदनी फैली है; इस पद के अनुसार संसार का फंदा कटता है। वे दीन-दुखी की पुकार सुनते हैं।
जहाँ पाठ में अंतर मिलता है
पद 3 के एक वाक्यांश में प्रतियाँ बराबर बँटी हैं: "सकल मन हारिणि" (सबका मन हरने वाली) या "कलुष कलि हारिणि" (कलियुग का कलुष हरने वाली)। यह पेज पहला रूप रखता है।
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