आरती

जय सरस्वती माता: सरस्वती जी की आरती

जय सरस्वती माता सरस्वती जी की पारंपरिक हिंदी आरती है, और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं। इस पेज पर पूरा पाठ है: टेक और छह पद, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
हिंदी
रचयिता या स्रोत
पारंपरिक; रचयिता ज्ञात नहीं
लंबाई
टेक और छह पद

इस पाठ के बारे में

वसंत पंचमी पर और नवरात्रि की सरस्वती पूजा में स्कूल और परिवार यह आरती गाते हैं। इसमें देवी का पारंपरिक चित्र है: चंद्रमा जैसा मुख, कमल पर आसन, हंस की सवारी, एक हाथ में वीणा और दूसरे में माला।

एक पद में रामायण से जुड़ी वह कथा है जो कुछ परंपराओं में कही जाती है: सरस्वती ने मंथरा की मति बदली, जिससे वे घटनाएँ हुईं जो रावण के अंत तक पहुँचीं। हर पद के बाद टेक लौटती है।

पाठ

टेक, हर पद के बाद फिर गाई जाती है

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

जय हो सरस्वती माता, जो सद्गुण और वैभव से संपन्न हैं और तीनों लोकों में विख्यात हैं।

पद 1

चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥

चंद्रमा जैसे मुख वाली, कमल पर विराजी, आपकी आभा मंगलमयी है। शुभ हंस की सवारी शोभती है और आपका तेज अतुल है।

पद 2

बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥

बाएँ हाथ में वीणा है और दाएँ हाथ में माला। सिर पर मणियों का मुकुट शोभता है और गले में मोतियों की माला।

पद 3

देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥

हे देवी, जो आपकी शरण में आए, उनका आपने उद्धार किया। दासी मंथरा में पैठकर आपने रावण का संहार कराया।

पद 4

विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥

विद्या और ज्ञान देने वाली, ज्ञान का प्रकाश भरिए। मोह, अज्ञान और अंधकार का जग से नाश कीजिए।

पद 5

धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥

माँ, धूप, दीप, फल और मेवा स्वीकार कीजिए। ज्ञान की दृष्टि दीजिए और जग का निस्तार कीजिए।

पद 6

माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी ज्ञान भक्ति पावे॥

इस पद के अनुसार जो कोई माँ सरस्वती की आरती गाता है, उसे हित, सुख, ज्ञान और भक्ति मिलती है।

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