आरती

ॐ जय सूर्य भगवान: सूर्य देव की आरती

ॐ जय सूर्य भगवान सूर्य देव की पारंपरिक हिंदी आरती है, और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं। इस पेज पर पूरा पाठ है: टेक और सात पद, हर एक के अर्थ के साथ।

भाषा
हिंदी
रचयिता या स्रोत
पारंपरिक; रचयिता ज्ञात नहीं
लंबाई
टेक और सात पद

इस पाठ के बारे में

परंपरा में रविवार सूर्य का दिन है, और उस दिन सूर्योदय पर, रथ सप्तमी और मकर संक्रांति पर यह आरती गाई जाती है। इसमें सूर्य का पूरा दिन है: सारथी अरुण, सात घोड़े, उदयाचल पर उदय, और संध्या में घर लौटता गोधन।

एक पद में आदित्य हृदय का नाम आता है, जो रामायण का सूर्य को समर्पित संस्कृत स्तोत्र है। हर पद के बाद टेक लौटती है।

पाठ

टेक, हर पद के बाद फिर गाई जाती है

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत के नेत्रस्वरूप, तुम हो त्रिगुण स्वरूप।
धरते सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान। आप जगत के नेत्र हैं और त्रिगुण स्वरूप हैं, सब आपका ही ध्यान करते हैं।

पद 1

सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी।
तुम चतुर्भुजधारी।
अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे।
तुम हो देव महान॥

हे प्रभु, अरुण आपके सारथी हैं, आप श्वेत कमल और चार भुजाएँ धारण करते हैं। आपके सात अश्व हैं, आप करोड़ों किरणें फैलाते हैं: आप महान देव हैं।

पद 2

उषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते।
सब तब दर्शन पाते।
फैलाते उजियारा, जगता तब जग सारा।
करे सब तब गुणगान॥

भोर में जब आप उदयाचल पर आते हैं, तब सब दर्शन पाते हैं। आप उजियारा फैलाते हैं, तब सारा जग जागता है, और सब आपका गुणगान करते हैं।

पद 3

संध्या में भुवनेश्वर, अस्ताचल जाते।
गोधन तब घर आते।
गोधूलि बेला में, हर घर हर आँगन में।
हो तव महिमा गान॥

संध्या में, हे भुवनेश्वर, आप अस्ताचल जाते हैं, तब गोधन घर लौटता है। गोधूलि की बेला में हर घर और आँगन में आपकी महिमा गाई जाती है।

पद 4

देव दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते।
आदित्य हृदय जपते।
स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी।
दे नव जीवनदान॥

देव, दानव, नर-नारी, ऋषि और मुनि आपको भजते हैं और आदित्य हृदय जपते हैं। यह स्तोत्र मंगलकारी है और इसकी रचना अनोखी है; इस पद के अनुसार यह नया जीवन देता है।

पद 5

तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार।
महिमा तब अपरम्पार।
प्राणों का सिंचन करके, भक्तों को अपने देते।
बल, बुद्धि और ज्ञान॥

आप तीनों कालों के रचयिता और जगत के आधार हैं, और आपकी महिमा अपार है। आप प्राणों को सींचकर अपने भक्तों को बल, बुद्धि और ज्ञान देते हैं।

पद 6

भूचर जलचर खेचर, सबके हो प्राण तुम्हीं।
सब जीवों के प्राण तुम्हीं।
वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने।
तुम ही सर्वशक्तिमान॥

भूमि, जल और आकाश के जीव: आप ही सबके प्राण हैं। वेद और पुराण बखान करते हैं, सब धर्म आपको मानते हैं: आप ही सर्वशक्तिमान हैं।

पद 7

पूजन करति दिशाएँ, पूजे दश दिक्पाल।
तुम भुवनों के प्रतिपाल।
ऋतुएँ तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी।
शुभकारी अंशुमान॥

दिशाएँ और दस दिक्पाल आपकी पूजा करते हैं; आप लोकों के रक्षक हैं। ऋतुएँ आपकी दासी हैं। आप शाश्वत और अविनाशी हैं, शुभकारी अंशुमान।

जहाँ पाठ में अंतर मिलता है

जिन प्रतियों से मिलाया गया, उनमें टेक में "त्रिगुण स्वरूप" है। इस पेज के पिछले रूप में वहाँ "त्रिगुण प्रधान" था, जो किसी प्रति में नहीं मिला, इसलिए उसे सुधारा गया।

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